पृष्ठ:प्रसाद वाङ्मय खंड 3.djvu/३०५

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

________________

और मैं उन पर इस तरह नियन्त्रण न कर सकूँगी। इसलिए बैंक और औपधालय, ग्रामसुधार और प्रचार विभाग, सब एक ही स्थान पर हो । तो ठीक है । शेरकोट मे ही सब विभागो के लिए कमरे बनवाने की व्यवस्था कर दो न । किन्तु इसम मैं एक भूल कर गई हूँ। क्या उसके सुधारन का कोई उपाय नही है। भूल कैसी? कुछ लोग ऐसे होते है, जो जान-बूझकर एक रहस्यपूर्ण घटना को जन्म दते हैं । स्वय उसमे पडते हैं और दूसरा को भी फंसाते हैं। मैं भी शेरकोट को बैंक के लिए चुनने में कुछ इस तरह मूर्ख बनाई गई हूँ। इद्रदेव ने हंसते हुए कहा-मैं देख रहा हूँ कि तुम अधिक भावनामयी होती जा रही हो । यह सन्देह अच्छा नहो । शेरकोट के लिए तो मा ने सब प्रबन्ध कर भी दिया है । अव फिर क्या हुआ? शरकोट एक पुरान वश की स्मृति है । उस मिटा दना ठीक नहीं। अभी मधुवन नाम का एक युवक उसका मालिक है । तहसीलदार स उसकी कुछ अनवन है इसलिए यह मधुवन । अच्छा तो मैं क्या कर सकता हूँ। तुम बैंक न भी बनवाजो तो होता क्या है। अब तो वह बेचारा उस शरकोट से निकाला ही जायगा। ___ तुम एक बार मौ स कहो न | और नीलवाली कोठी की मरम्मत करा दो इसम रुपये भी कम लगगे, और नोलवाली कोठी | --आश्चय स इद्रदव न उसको आर देखा। हा, क्या? अरे वह तो भुतही कोठी कही जाती है। जहा मनुष्य नही रहते वही तो भूत रह मकगे? इन्द्रदेव । मैं उम कोठी का बहुत प्यार करती है। कब से शैला ? -हसते हुए इन्द्र ने उसका हाथ पकड लिया । इन्द्र । तुम नही जानते । मेरी माँ यही कुछ दिनो तक रह चुकी है। इन्द्रदेव की आँखें जैसे बडी हो गई । उन्होन कुर्सी स उठ खडे होकर कहा -~-तुम क्या कह रही हो? बैठो और सुनो । मै वही कह रही हूँ, जिसक मुझे सच हान का विश्वास हो रहा है । तुम इसके लिए कुछ करो। मुझे तुमसे दान लेन में तो काई सकोच नही । आज तक तुम्हारे ही दान पर मैं जी रही हूँ किन्तु वहा रहने दकर मुझे तितली २७७