पृष्ठ:प्रसाद वाङ्मय खंड 3.djvu/१९९

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अब मोहन के लिए उसके मन म उतनी व्यथा न थी। मोहन भी श्रीचन्द का वावूजी कहन लगा था। वह मुख म पलने लगा। किशोरी परिजात के पास बैठी हुई अपनी अतीत-चिन्ता म निमग्न थी। नन्दा क साथ पगली स्नान करके लौट आई थी। चादर उतारत हुए नन्दो न पगली स कहा-बेटी । उसन कहा-मा। तुमको सव किस नाम म पुकारते थे, यह तो मैने आज तक न पूछा । बतलाआ वटी वह प्यारा नाम । मॉ, मुझे चौबाइन 'घण्टी नाम स बुलाती थी। चादी की सुरीली घण्टी-सी ही तरी बाली हे बटी । किशोरी सुन रही थी। उसने पास आकर एक वार आख गडा कर दखा और पूछा-क्या कहा । घण्टी? हाँ बहूजी--वही वृन्दावनवाली घण्टा । किशोरी आग हो गई। वह भभक उठा-निकल जा डायन | मरे विजय का खा डालन वाली नुडल । ___ नन्दो तो पहले एक वार किशोरी की डाट पर स्तब्ध रही पर वह कब सहनवाली | उसने कहा--मुंह संभालकर बाते करो बहू | मैं किसी से दबनेवाली नही । मरे सामने किसका साहस है, जो मरी वेटी-मरी घण्टी--को आँख दिखलाव | साख निकाल लू । तुम-दाना अभी निकल जाआ-भी जाआ नही तो नौकरा म धक्क दकर निकलवा दूगी ।-हाफती हुई किशारी न कहा। बस इतना ही ता--गौरी रूठे अपना मुहाग ले | हम लोग जाता है मरे - नन्दो न तीखेपन स कहा। किशोरी काध म उठी और आलमारी खालकर नाटो का वण्डल उसक सामन फेकती हुइ वाली-लो सहजा अपना रुपया, भागा। नन्दो ने घण्टी से कहा-चला बटी ! अपना सामान 7 ला। दोनों ने तुरन्त गठरो दवाकर बाहर की राह ली । किशारी न एक बार भी उन्हें ठहरन के लिए न कहा। उस समय गीचद्र और मोहन गाडी पर चढकर हवा खान गये थे। किशोरी का हृदय इस नवागन्तुक कल्पित सन्तान स विद्राह तो कर हा रहा था, वह अपना सच्चा धन गँवाकर इस दत्तक पुत्र स मन भुलवान म असमथ ककाल १७१