पृष्ठ:प्रसाद वाङ्मय खंड 3.djvu/१९०

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बाबा बहुत बिगडे हैं—आज तीन दिन हुए, मुझस बोलते नही । नय तुमको स्मरण हागा कि मेरा पढना-लिखना जानकर तुम्ही ने एक दिन कहा था कि तुम अनायास ही जगल म शिक्षा का प्रचार कर सकती हो-भूल तो नही गय? नही, मैने अवश्य कहा था। तो फिर मेरे विचार पर बावा इतने दुखी क्या हैं ? उन्होंने उसे अच्छा न समझा होगा। तब मुझे क्या करना चाहिए? जिसे तुम अच्छा समझो। नये । तुम बडे दुष्ट हा—मेर मन म एक आकाक्षा उत्पन करक अव उसका कोई उपाय नहो वतात । जा जाकाक्षा उत्पन्न कर देता है, वह उसकी पूर्ति भी कर दता है ऐसा ता नहीं देखा गया । तर भी तुम क्या चाहती हा ? ___ मैं इस जगला जीवन से ऊब गई है, मैं कुछ और हा चाहती हूँ—वह क्या है ? तुम्ही बता सकते हो। ___मैंने जिसे जो बताया, उसे वह समझ न सका गाला । -मुझसे न पूछो, मैं आपत्ति का मारा तुम लोगो की शरण म जा रहा है--कहते-कहते नये ने सिर नीचा कर लिया । वह विचारो में डूब गया। गाला चुप थी। सहसा भालू जार से भूक उठा, दोनो न घूमकर देखा कि बदन चुपचाप खडा है । जव नये उठकर खड़ा होने लगा, ता वह वाला-गाला | मैं दो वात तुम्हारे हित की कहना चाहता हूँ, और तुम भी सुनो नये । दोनो ने सिर नीचा कर लिया। __मरा अब समय हो चला। इतने दिना तक मैने तुम्हारी इच्छा म कोई वाधा नही दी, यो कहो कि तुम्हारो काई वास्तविक इच्छा ही नही हुई, पर अब तुम्हारा जीवन चिरपरिचित देश की सीमा पार कर रहा है। मैंने जहा तव उचित समझा, तुमको अपने शासन म रक्खा, पर अब मैं यह चाहता हूँ कि तुम्हारा पथ नियत कर दूं और किसी उपयुक्त पात्र की सरक्षता म तुम्ह छोड जाऊँ। -इतना कहकर उसने एक भेदभरी दृष्टि नये के ऊपर डाली । गाला कनखिया से देखती हुई चुप थी। बदन फिर कहने लगा-मरे पास इतनी सम्पत्ति है कि गाना और उसका पति जीवन भर सुख से रह सकते है–यदि उनकी ससार म सरल जीवन बिता लेने से अधिक इच्छा न हो । नये । मैं तुमको उपयुक्त समझता हूँ---गाला के जीवन की धारा सरल पथ मे बहा ले चलने की क्षमता तुम म है । तुम्हे यदि स्वीकार हो तो १६२ प्रसाद वाङ्मय