पृष्ठ:प्रसाद वाङ्मय खंड 3.djvu/१५४

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...... न होकर नुनने लगी। श्रीचन्द्र ने फिर कहना आरम्भ समारनट हो चुका है, अमृतसर की सब सम्पत्ति इसी स्त्री के यहाँ .10:। न उमार का यही उपाय है कि इसकी मुन्दरी कन्या लाली से 4 मरा दिया जाय। शारो ने नगर्व एक वार श्रीचन्द्र की ओर देखा, फिर सहसा कातरभाव मेलो --विजय स्टकर मथुरा चला गया है! मोचन्द्र ने पक्के व्यापारी के समान कहा---कोई चिन्ता नही, वह जा पापपा । तर तक हम लोग यहाँ रहे, तुम्हें कोई कप्ट तो न होगा? र अधिक चोट न पहुंचाओ। मैं अपराधिनी हूँ, मै सन्तान के लिए अन्धी हो रही थी! क्या मैं क्षमा न की जाऊंगी? --किशोरी को आंखो से आंसू गिरने लगे। अन्ला तो उसे बुलाने के लिए मुझे जाना होगा। नहो; उसे बुलाने के लिए आदमी गया है । चलो, हाथ-मुंह धोकर जलपान कर लो। अपने ही घर में धीचन्द्र एक अतिथि की तरह आदर-सत्कार पाने लगा।