पृष्ठ:प्रसाद वाङ्मय खंड 3.djvu/१४९

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निकाल लती है। मै तुम्हार भालपन पर हंस रहा था । तुम जानती हा कि ब्याह क व्यवसाय म तो मैंन कभी का दिवाला निकाल दिया है, फिर भी वही प्रश्न । चन्दा न अपना भाव संभालते हुए कहा-य सब तुम्हारी वनावटी वात है । मैं जानती हूँ कि तुम्हारी पहली स्त्री और ससार तुम्हारे लिए नहीं क वरावर है। उसक लिए कोइ बाधा नहीं। हम-तुम जव एक हो जायेगे, तब सब सम्पत्ति तुम्हारी हो जायगी । | श्रीचन्द्र-यह तो यो भी हो सकता है, पर मरी एक सम्मति है उस माननान-मानना तुम्हारे अधिकार म है । ह बात बडी अच्छी। चन्दा-वह क्या ? श्रीचन्द्र ने एक क्षण म हिसाव बैठा लिया। उनक लिए रुपयो का नयानया प्रवन्ध साचना साधारण बात थी। उसन ठहरकर वडी गम्भीरता से कहा -~~लाली के लिए सम्बध खोज लिया है पर वह तुम्हार प्रस्ताव के अनुसार चलन स न हो सकगा। चन्दा-क्यो? थीचन्द्र-~~-तुम जानती हो कि विजय मर लडक क नाम स प्रसिद्ध ह आर काशी म अमृतसर की गन्ध अभी नही पहुँची ह । मैं यदि तुमस विधवा विवाह कर लेता है, ता इस सम्बन्धम अडचन भी होगी, और बदनामी भी । क्या तुमका वह जामाता पसन्द नही । __चन्दा न एक वार उल्लास स वडी-बडी जाँख खोलकर दखा और बोलीयह तो बडी अच्छी बात सोची । श्रीचन्द्र ने कहा-तुमका यह जानकर आर प्रसन्नता हागी कि मन जा कुछ रुपय किशोरी को भेजे हैं, उनस उस चालाक स्त्री ने अच्छी जमीदारी बना ली है। और, काशी म अमृतसर वाली कोठी की वडी धाक है। वही चलकर लाली का ब्याह हो जाएगा। तव, हम लोग यहां की सम्पत्ति और व्यवसाय स जानन्द लगे । किशोरी धन, बटा, वह लकर सन्तुष्ट हो जायगी | क्या कसी रही । चन्दा न मन म सोचा, इम प्रकार यह काम हा जान पर, हर तरह की मुविधा रहेगी। समाज क हम लाग विद्रोही भी नही रहगे और दाम भी बन जायगा । वह प्रसन्नतापूर्वक सहमत हुई। दूसर दिन क प्रभात म वही सूति थी! श्रीचन्द्र और चन्दा बहुत प्रसन्न हा उठ। वगीच की हरियाली पर आँखें पडत ही मन हल्का हा गया। चन्दा न कहा-आज चाय पीकर ही जाऊंगी। ककाल ११६