पृष्ठ:प्रसाद वाङ्मय खंड 1.djvu/७२५

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रश्मिया अतरिक्ष परिमल निज रंग मासल हिमवती उस लार थी हस वह चन्द्र स्पन्दित देखता लहरा प्रतिफलिर उस प्रेम सब अपनी 1 समरम सुदर र चेतनता आनद प्रसाद वाङ्गमय १७०४॥