पृष्ठ:प्रसाद वाङ्मय खंड 1.djvu/४४२

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गंज उठा कानो मे-- "जीवन अलभ्य है, जीवन सौभाग्य है ।" उठी एक गव सी किन्तु झुक गई अनुनय की पुकार मे "उसे छोड दीजिए"-निकल पडा मुंह से । हंसे सुलतान, और अप्रतिम होती में जकडी हुई थी अपनी ही लाज शृङ्खला में। प्रार्थना लौटाने का उपाय अब कौन था? अपने अनुग्रह के भार से दवाते हुए कहा सुलतान ने- "जाने दो रानी की पहली यह आज्ञा है।" हाय रे हृदय । तूनें कौडी के मोल बेचा जीवन का मणि-कोष और आकाश को पकड़ने की आशा मे हाथ ऊंचा किये सिर दे दिया अतल में । "अन्तनिहित थी लालसाएं, वासनाएं जितनी अभाव मे जीवन की दीनता मे और पराधीनता मे पलने लगी वे चेतना के अनजान मे। धीरे धीरे आती है जैसे मादकता आखो के अजान मे, ललाई मे ही छिपतो , चेतना थी जीवन की फिर प्रतिशोध की। किन्तु क्सि युग से वासना के विदु रहे सीचते मेरे संवेदनो को। यामिनी के गूढ अन्धकार म सहसा जो जाग उठे तारा से दुबलता को मानतो सो अवलम्व में खडो हुई जीवन की पिच्छिल सी भूमि पर । बिखरे प्रलोभनो को मानती सी सत्य में शासन की कामना म झूमी मतवाली हो । लहर ॥ ३९१