पृष्ठ:प्रसाद वाङ्मय खंड 1.djvu/३४

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प्रलय । किन्तु विश्व को विवृति हो जाने पर उसकी ससृति में इस विषमता को परिणति का स्रोत कहा से अग्रसर होता है और ससृति का एक पृष्ठ खुलता है ? और, आदिम मानव-समाज के धरातल पर उसका प्रथम स्फुरण कौन है ? विषमता के इस आदिम प्रसग की कडी पूर्ववर्ती युग मन्दभा से जुडी चली आ रही है रूप और प्रकार मे आगत परिवतन उसकी विवृति प्रक्रिया के कार्य-कारण योग बनाते चले आ रहे है- युगो को चट्टानो पर सृष्टि डाल पद चिह्न चली गम्भीर, देव, गधव असुर की पषित अनुसरण करती उसे अधीर । (श्रद्धा) मानव समाज की गठनो मुख और विकासोन्मुख दशा के ठीक पहले पुरुष के प्रति नारी का अनुष्ठानात्मक आत्मसमपण हो चुकता है । इससे पूर्व उभय के सबध की अवस्था केवल आत्मनिवेदन की रहती है जिसके भीलर आगिक अभावो की पूर्ति इच्छा भूत और कारण भूत होती है। विशृखल, अस्थिर और अरक्षित जीवन क्रम को व्यवस्थित और सुरक्षित रूप देने की दिशा मे, उत्पादन की अपनी असामान्य समयता, वेगवती अभीप्सा और आवयवीय विलक्षणता से पुरुष और उसके पुरपाथ का नागे सक्रम नियोजन चाहती है और फिर इस नियोजन मे वह नारी स्वय ही प्रथम नियुक्त-सत्व बन जाती है, जो नारी का अनुष्ठानात्मक आत्मसमपण होता है। फिर तो सस्कृति के विकास के प्रतिपग उसकी शेप स्वतन्त्रता को निगलते जाते है । नारी-पुरुषाधीनता के साथ-साथ सामाजिक-वैषभ्य के महानाटक का पहला दृश्य सुलता है और समर्पिता नारी नर के समक्ष पडी होती है- किन्तु वोलो "क्या समपण आज का हे देव । बनेगा चिर-बध पारी हृदय हेतु सदैव । आह में दुवल, कहो क्या ले सकूँगी दान । वह, जिसे उपभोग करने मे विकल हो प्रान" (वासना) पुरप मौन रहता है। उसका यह मौन आगामी प्रवचना का और कदाचित अवसरवादिता या भी मूल है-- छल याणी की वह प्रवचना हृदयो को शिशुता को गणित खेल खिलाती, भुलवाती जा उस निमल विभुता को। परम आगे चल पर पुरुष कहता है "तब तुम प्रजा वनो मत गनी, नरे का प्राक्कथन ॥४१॥