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प्रबन्ध पुष्पाञ्जलि

अधिक। पकड़ते समय उसने बहुत तङ्ग किया था। बाद में बाँध दिये जाने पर भी उसने अपना बन्धन तोड़ कर निकल जाने का बहुत कोशिश की। पर व्यर्थ।

इस खेदे में एक फीलबान की पसली टूट गई। जिस समय शिकारी हाथी जङ्गली हाथी पर खेदा किये हुए थे, उस समय कालीप्रसाद नाम का हाथी अपने फीलबान को ले कर बेतहाशा भागा और एक पेड़ के नीचे से निकला। पेड़ की लटकती हुई एक डाल फीलबान की छाती पर लगी। उस के आघात से उस बेचारे की एक पसली टूट गई।

इस के बाद और कई खेदे हुए। कितने ही बड़े बड़े नर और मादा हाथो गिरफ्तार किये गये। छोटे छोटे पाठे भी कई मिले। एक पाठा जव पड़ाव को लाया जा रहा था तब कई दफे राह में बेहोश हो हो कर गिरा। पानी डाल कर वह होश में लाया गया। पर जान पड़ता था कि उस के पैर में चोट आ गई थी, इस से वह चट न सकता था। मालूम नहीं उस की क्या गति हुई।

जैसा ऊपर लिखा गया है, जब जङ्गली हाथी पकड़ कर पड़ाव को भेजा जाता है तब खेदे के हाथी उसकी गर्दन के रस्सों को पकड़ कर आगे चलते हैं। जो रस्से पिछले पैरों में बंधे रहते हैं उनको भी कई हाथी पीछे