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शिक्षा

न तो लड़कों का मन ही लगता है और न वे उन्हें समझ ही सकते हैं। शिक्षकों का मन अन्ध-भक्ति या अन्ध परम्परा में डूबा रहता है। उसकी प्रेरणा से वे प्रत्यक्ष विद्या का आदर नहीं करते, करते हैं विद्या की तसवीर का, विद्या के प्रतिबिम्ब का। उनके हृदय में नकली ही शिक्षा की भक्ति का वेग अधिक होता है। इससे उनको यह नहीं सूझता कि जब घर, द्वार, खेत, खलिहान, गली, कूचे आदि में देख पड़ने वाली चीज़ों का ज्ञान अच्छी तरह हो जाय तभी उनके आगे की चीज़ों का ज्ञान प्राप्त करने का साधन, किताबें, लड़कों के हाथ में देना चाहिए। वे नहीं जानते कि नये नये तरीकों से घर और पास-पड़ोस से दूर की चीज़ों का ज्ञान प्राप्त करने का वही उपयुक्त समय है। उसके पहले लड़कों के हाथ में किताबें देने की कोई जरूरत नहीं। इस तरीके से शिक्षा देना सिर्फ इसी कारण से मुनासिब नहीं कि अप्रत्यक्ष रीति से प्राप्त हुए ज्ञान की अपेक्षा प्रत्यक्ष रीति से प्राप्त हुआ ज्ञान अधिक मूल्यवान है, किन्तु इस कारण से भी कि जिन चीज़ों की शिक्षा लड़कों को दी जाने को है उनका तजरिबा पहले ही से उनको जितना अधिक होगा उतना ही अधिक किताबें पढ़ते समय उन चीज़ों का बयान उनकी समझ में आवेगा; उतना ही अधिक अच्छी तरह वे उन चीज़ों का ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे। एक दोष यह भी है कि यह रूढिप्राप्त या