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पुरातत्त्व का पूर्वेतिहास


कम्पनी के अँगरेज़-कर्मचारियों हो ने किया और उसकी सफलता के बहुत कुछ साधन भी उन्हीं लोगों ने प्रस्तुत किये।

सर विलियम जोन्स पहले अँगरेज़ थे जिन्होंने संस्कृत- भाषा का ज्ञान-सम्पादन किया। इस काम में उन्हें बड़ी बड़ी बाधाओं का सामना करना पड़ा। पण्डितों की दृष्टि में वे म्लेच्छ थे। म्लेच्छ को संस्कृत पढ़ा कर भला कौन धर्म-भीरु पण्डित अपनी धर्म-हानि करेगा? परन्तु दृढ़- प्रतिज्ञ होने के कारण, सभी आगत विघ्नों के पार जाकर जोन्स साहब ने काफी संस्कृत-ज्ञान प्राप्त कर लिया। संस्कृत सीख कर उन्होंने शकुन्तला-नाटक, और मनुस्मृति का अनुवाद अँगरेज़ी में प्रकाशित किया। उन्हें देख कर योरप के विद्वानों में खलबली मच गई। उन्होंने कहा, जिस जाति के ज्ञानभाण्डार में ऐसी ऐसी पुस्तकें विद्यमान हैं उसका भूतकाल बड़ा ही उज्ज्वल रहा होगा; उसमें ऐसे ऐसे न मालूम और कितने ग्रन्थ- रत्न पड़े होगे; अतएव इस जाति के पूर्वेतिहास से परिचय प्राप्त करने से अनेक लाभ होने की सम्भावना है।

इस प्रकार की सम्भावना से प्ररित होकर कई अँगरेज़ इस देश के पुराने ग्रन्थों का पता लगाने और उनके अनुशीलन में प्रवृत्त हो गये। इस प्रवृत्ति--इस ज्ञान लिप्सा--का फल यह हुआ कि सर विलियम जोन्स