पृष्ठ:पीर नाबालिग़.djvu/३३

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अनाजान इम्तिहान पास करता गया। वह दिन भी आया कि उसने शान से मैट्रिक पास किया और फौरन ही हमीद के दफ्तर में नौकरी लग गई। शादी भी अगले साल हो गई। उस वक्त हुजूर, गुलाम ने दिल खोल कर खर्च किया। बड़े घर का बेटी थी ! आप जानते हैं हुजूर । गरीव हूँ, मगर इब्जत रखता हूँ बड़े-बड़े हाकिम-हुक्काम दावत में आए । हुजूर ने भी इस गुलाम की इज्जन बढ़ाई थी। बाह, कैला खुशी का दिन था। पर, हुजूर, उसो दिन बद्द खुशी भी खत्म हो गई। बशीर ने भी भाई का रास्ता अख्तियार किया, और बूढ़े बाप और यतीम भाइयों को छोड़, बीवी का लेकर अलहदा हो गया । अब्बा जैसे कोई चीज ही नहीं हैं। सब कुछ बीबी है !' 'माना कि जवानी दीवानी होती है। मगर हुजूर, मैं भी अपने बाप का बेटा था । अत्रा जब तक जिन्दा रहे, कभी बीबी को शक्ल दिन में नहीं देखी। हांलाकि वह तीन बच्चों की माँ हो चुकी थी। तनख्वाह जो पाता था, अब्बा के हाथ में रखता था। मुझे मतलब दो रादियों से था। उनके मरने पर मैंने दुनियाँ को सूना समझा। मगर हुजूर, वे दिन ही और थे। क्या किया जाय । सो बशीर मियाँ भी बीबो को लेकर अलहदा हो गए। और मेरा वहीं ढर्रा चलता रहा। दोनों वक्त पकाता, बच्चों को खिलाता और दफ्तर का रास्ता नापता। हॉ, हफ्ते में दो बार बशीर और हमीद के घर हो आता हूँ। उनके बच्चों को दो घड़ी खिला आता हूँ। न मानें वे, पर हूँ तो उनका अब्बा ! बच्चे बड़े सुशील हैं, देखते हैं तो किलकारी मार कर लिपट जाते हैं, खून का जोश है हुजूर, आप देख लेना-ये बच्चे 'एक दिन इस बूढ़े के नाम को राशन करेंगे। २