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स्तीफ़ा


मारकर आये हो, मैं ग़रूर से फूली नहीं समाती। मार खाकर आते, तो शायद मैं तुम्हारी सूरत से भी घृणा करती। यों ज़बान से चाहे कुछ न कहती, मगर दिल से तुम्हारी इज्ज़त जाती रहती। अब जो कुछ सिर पर आयेगी खुशी से झेल लूँगी.....। कहाँ जाते हो, सुनो सुनो, कहाँ जाते हो ?

फ़तहचंद दीवाने होकर जोश में घर से निकल पड़े। शारदा पुकारती रह गई। वह फिर साहब के बँगले की तरफ जा रहे थे। डर से सहमे हुए नहीं; बल्कि ग़रूर से गर्दन उठाये हुए‌ पक्का इरादा उनके चेहरे से झलक रहा था। उनके पैरों में वह कमज़ोरी, आँखों में वह बेकसी न थी। उनकी कायापलट-सी हो गई। वह कमज़ोर बदन, पीला-मुखड़ा, दुबले बदनवाला, दफ्तर के बाबू की जगह अब मर्दाना चेहरा, हिम्मत के भरा हुआ, मजबूत गठा हुआ जवान था। उन्होंने पहले एक दोस्त के घर जाकर उसका डंडा लिया और अकड़ते हुए साहब के बङ्गले पर जा पहुँचे।

इस वक्त नौ बजे थे। साहब खाने की मेज़ पर थे। मगर फ़तहचंद ने आज उनके मेज पर से उठ जाने का

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