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परीक्षा गुरु
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हुए परंतु सौभाग्यवश उस समय बाबू बैजनाथ आ गए इसलिए सब काम जहां का तहां अटक गया.

“बिहारी बाबू के किस बात का मामला हो रहा है?” बाबू बैजनाथ ने पहुँचते ही पूछा.

“कुछ नहीं, यह तो ताश के खेल का ज़िक्र था” मुन्शी चुन्नीलाल ने साधारण रीति से कहा.

बिहारी बाबू कहते हैं कि “मैं पत्ते लगाने सिखा दूँ जिस तरह पत्ते लगाकर आप एक धनवान जागीरदार से ताश खेलें और बाज़ी बद लें. जो हारेंगे तो सब नुक्सान मैं दूंगा, और जीतेंगे तो उसमें से चौथाई ही मैं लूंगा” लाला मदनमोहन ने भोले भाव से सच्चा वृत्तान्त कह दिया.

“यह तो खुला जुआ है और बिहारी बाबू आप को चाट लगाने के लिये प्रथम यह सब्ज बाग दिखाते हैं” बाबू बैजनाथ कहने लगे "जिस तरह से पहले एक मेवनें, आप को गड़ी दौलत का तांबेपत्र दिखाया था, और वह सब दौलत गुप चुप आप के यहां ला डालने की हामी भरता था परंतु आप से खोदने के बहानेतक सौ-पचास रुपये मार ले गया तब से लौट कर सूरत तक न दिखाई! आप को याद होगा कि आप के पास एक बदमाश स्याम का शाहजादा बनकर आया था, और उसने कहा था कि “मैं हिन्दुस्तान की सैर करने आया हूं मेरे जहाज़ ने कलकत्ते में लंगर कर रखा है मुझको यहां खर्च की ज़रूरत है आप अपने आढ़तिये का नाम मुझे बता दें मैं अपने नौकरों को लिखकर उसके पास रुपये जमा करा दूंगा जब उसकी इत्तला आप के पास आ जाय तब आप रुपये मुझे दे दें” निदान आप के आढ़तिये के