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परीक्षा गुरु
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दूसरी चिट्ठी कलकत्ते से हमल्टीन कंपनी जुएलर(जोहरी) की आई थी. उसमें लिखा था "आपके आर्डर के बमूजिब हीरों की पाकिट चेन बनकर तैयार हो गई है, एक दो दिन में पालिश करके आपके पास भेजी जायेगी और इसपर लागत चार हज़ार अंदाज रहेगी, आपने पन्ने की अंगूठी और मोतियों की नेकलेस के रुपये अबतक नहीं भेजे सो मेहरबानी करके इन तीनों चीज़ों के दाम बहुत जल्द भेज दीजिये”

तीसरा फ़ारसी ख़त अलीपुर से अब्दुर्रहमान मेट का आया था उसमें लिखा था कि “रुपये जल्दी भेजिये नहीं तो मेंरी आबरू में फ़र्क़ आ जायेगा और आपका बड़ा हर्ज होगा. कंकरवाले का रुपया बहुत चढ़ गया इसलिये उसने खेप भेजनी बंद कर दी. मजदूरों का चिट्ठा एक महीने से नहीं बँटा इस लिये वह मेरी इज्जत लिया चाहते हैं. इस ठेके बाबत पांच हज़ार रुपये सरकार से आपको मिलने वाले थे वह मिले होंगे, मेहरबानी करके वह कुल रुपये यहां भेज दीजिये जिससे मेरा पीछा छूटे. मुझको बड़ा अफसोस है कि इस ठेके में आपको नुक्सान रहेगा परन्तु मैं क्या करूँ? मेरे बस की बात न थी, ज़मीन बहुत ऊँची-नीची निकली, मज़दूर दूर-दूर से दूनी मज़दूरी देकर बुलाने पड़े, पानी का कोसों पता न था मुझसे हो सका जहाँ तक मैंने अपनी जान लड़ाई. खैर इसका इनाम तो हुजूर के हाथ है परन्तु रुपये जल्दी भेजिये, रुपयों के बिना यहाँ का काम घड़ी भर नहीं चल सकता."

लाला मदनमोहन नौकरों को काम बताने और उनकी तनख्वाह का ख़र्च निकालने के लिये बहुधा ऐसे ठेके वग़ैरह ले लिया