पृष्ठ:परिवार, निजी सम्पत्ति और राज्य की उत्पत्ति.djvu/४२

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। जहा परियार घनिष्ठ रूप से एकजुट है, यहां यूथ शायद ही कभी अपवादस्वरूप पाया जाता हो। दूसरी पोर, जहां स्वच्छन्द यौन- सम्बन्ध या नर-पशु का अनेक मादा-गशुप्रो के साथ सम्बन्ध सामान्यतः पाया जाता है, वहां लगभग स्वाभाविक रूप से यूथ का आविर्भाव होता है ... यूय के आविर्भूत होने के लिये मावश्यक होता है कि परिवार के सम्बन्ध ढीले पड गये हो और व्यष्टि फिर स्वतंत्र हो गयी हो। इसी लिये पक्षियों में संगठित वृन्द बहुत कम देखने में आते है... दूसरी ओर चूकि स्तनधारी पशुप्रो में पशु परिवार में नहीं विलीन हो जाता, इसी लिये उनमे कमोवेश संगठित समाज पाये जाते है.. अतएव यूय की सामूहिक भावना ( सामूहिक अन्तःकरण ) का, उसके जन्म के समय , परिवार को सामूहिक भावना से बड़ा शत्रु और कोई नहीं हो सकता। हमे यह कहने में हिचकिचाना नहीं चाहिए कि यदि परिवार से ऊंचा कोई सामाजिक रूप विकसित हो पाया है, तो उसका केवल एक यही कारण हो सकता है कि उस रूप में ऐसे परिवार समाविष्ट हुए जिनमे बुनियादी परिवर्तन हो चुका था। और इस बात से यह सम्भावना नष्ट नहीं हो जाती कि ठीक इसी कारण ये परिवार, वाद मे पहले से कहीं अधिक उपयुक्त परिस्थितियां उत्पन्न होने पर, फिर अपनी रचना करने में सफल हुए।" (एस्पिनास , उपरोक्त पुस्तक, जिरो-त्यूलो द्वारा, १८८४ में प्रकाशित "विवाह और परिवार की उत्पत्ति' में, पृष्ठ ५१८--५२० पर उद्धृत ।) इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि मानव-समाजों के बारे मे निष्कर्ष निकालने के लिये पशु-समाजों का कुछ महत्त्व निस्संदेह है, पर वह केवल नकारात्मक प्रकार का महत्त्व है। जहा तक हम पता लगा सके है, उच्चतर कशेरुक दंडियो मे केवल दो प्रकार के परिवार होते है : अनेक मादा-पशुओ के साथ एक नर का परिवार, अथवा एक-एक युग्म । दोनों सूरतों में नर केवल एक हो सकता है, यानी पति सिर्फ एक हो सकता है। नर की ईर्ष्या भावना , जो परिवार का सम्बन्ध-सूत्र है और उसकी सीमा भी, को यूथ का विरोधी बना देती है। मैथुन-ऋतु आने पर, उच्चतर सामाजिक , यूथ कही पर बिलकुल असम्भव हो जाता है, कही पर ढीला पड़ जाता है या एकदम टूट जाता है; और यदि अच्छी हालत में रहता है तो भी नर की ईर्ष्या के कारण उसके आगे के विकास में बाधा पडती है। इसी एक बात से सिद्ध हो जाता है कि पश-परिवार और आदिम मानव- पशु-परिवार