पृष्ठ:परिवार, निजी सम्पत्ति और राज्य की उत्पत्ति.djvu/१४४

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साराश यह है कि गोत्र-व्यवस्था का अन्त होने को था। समाज दिन- प्रति-दिन उसकी सीमाप्रो से आगे निकला जा रहा था। समाज की आखो के सामने जो घोर चिन्ताजनक बुराइयां पैदा हो रही थी, वह उन्हें भी दूर करने या कम करने में असमर्थ था। परन्तु, इसी बीच चुपचाप राज्य का विकास हो गया था। पहले शहर और देहात के वीच और फिर शहरी उद्योग की विभिन्न शाखाग्रो के बीच श्रम का विभाजन हो जाने से जो नये समूह बन गये थे, उन्होंने अपने हितो की रक्षा करने के लिये नये निकाय उत्पन्न कर डाले थे। नाना प्रकार के सार्वजनिक पद संस्थापित किये गये थे। इसके बाद नव-विकसित राज्य को सबसे अधिक स्वयं अपनी सेना की आवश्यकता थी, जो समुद्र मे विचरनेवाले एथेंसवासियो के लिये शुरू में नौ-सेना ही हो सकती थी, जो कभी-कभी छोटी-मोटी लड़ाइयों के लिये, और व्यापारी जहाजों की रक्षा करने के काम पा सके। सोलन के पहले ही किसी अनिश्चित समय मे छोटे-छोटे प्रादेशिक जिले वना दिये गये थे जो नौकेरी कहलाते थे। हर कबीले के क्षेत्र में बारह नौरी थे और हर नौकेरी के लिये आवश्यक था कि वह एक जंगी जहाज बनाये, उसे साज-सामान और नाविको से लैस करे और इसके अलावा दो घुडसवारो को तैनात करे। इस व्यवस्था से गोन-संघटन पर दो तरफ़ से चोट होती थी : एक तो उससे एक ऐसी सार्वजनिक सत्ता पैदा हो गयी थी जो समूची सशस्त्र जनता से भिन्न थी, दूसरे, वह जनता को सार्वजनिक कामों के लिये पहली बार रक्त-सम्बन्ध के अनुसार नहीं, बल्कि प्रदेश के अनुसार, समान निवास- स्थान के प्राधार पर, अलग-अलग वाटती थी। आगे हम देखेंगे कि इस चीज का क्या महत्त्व था। शोपित जनता को चूकि गोत्र-व्यवस्था से कोई सहायता नहीं मिल पाती थी, इसलिये वह केवल नये, उभरते हुए राज्य का ही भरोसा कर सकती थी। और राज्य ने सोलन के विधान के रूप में उसकी सहायता को और साय ही उसके द्वारा पुरानी व्यवस्था के मत्ये अपने को और सुदृढ़ कर लिया। सोलन के विधान ने- हमारा यहां इस बात से कोई सम्बन्ध नहीं है कि यह विधान ५६४ ई० पू० में किस तरह से कायम किया गया सम्पत्ति के अधिकारों का प्रतिप्रमण करके तथाकथित राजनीतिक प्रान्तियों के एक सिलसिले को शुरू कर दिया । अभी तक जितनी भी कान्तिया हुई है, उन सब का उद्देश्य एक तरह की सम्पत्ति की दूमरी तरह की मम्पत्ति १४६