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४६६ पदुमावति । २२ । पारबतौ-महेस-खंड । [२१३ - २१ . सिंहल में मुझे पद्मावती लग गई । उस का नाम सुन कर मैं ने राज्य और भोग- विलाम को छोड दिया ; तप और योग को लिया, अर्थात् उस के लिये तपस्या और योगाभ्यास करने लगा। निराश, अर्थात् सब आशा छोड कर (उसी के लिये ) दूस मठ में (महादेव को) सेया; सो वह श्रा कर महादेव को पूज कर चली गई पर मेरे मन को आशा न पूरी हुई, अर्थात् समागमाभिलाष मन हौं में रह गया । उमौ ने इस जीव को जलाने पर जलाया है; (अब यह जीव ) आधा निकल कर आधा घट (शरीर) में रह गया है। (दूस लिये) जो अध-जरा है वह विलम्ब नहीं लगाता; विलम्ब करने से बहुत पाता है। इतनी बोली कहते हो ( राजा के ) मुख से विरह को भाग (भभक) उठी। यदि महादेव (दौड कर उस आग को) न बुझाते तो वह ( चारो भोर) लग कर सब संसार को मार डालती ॥ २१३ ॥ (भर्तृहरि के लिये १३ ४ ३ दोहे को टीका देखो) चउपाई। उपना पारबती मन चाऊ। देखउँ कुर केर सत-भाज॥ दहुँ यह बीच कि पेमहि पूजा । तन मन एक कि मारग दूजा ॥ भइ सु-रूप जानहुँ अपछरा। बिहँसि कुर कर आँचर धरा ॥ सुनहु कुर मो सउँ एक बाता। जस रंग मोहि न अउरहिँ राता॥ अउ बिधि रूप दोन्ह हइ तो का। उठा सो सबद जाइ सिउ-लोका॥ तब हउँ तो कहँ इँदर पठाई। गइ पदुमिनि तुइँ आकरि पाई ॥ अब तजु जरन मरन तप जोगू। मो सउँ मानु जरम भरि भोगू॥ दोहा। हउँ आरि कबिलास कइ जेहि सरि पूज न कोइ । मोहिँ तजि सर्वरि जो ओहि मरसि कउनु लाभ तोहि होइ ॥ २१४॥ पारबतौ = पार्वती। उपजदू (उत्पद्यते) का भूतकाल, पुंलिङ्ग-प्रथम-पुरुष का एक-वचन । चाऊ = चाह = इच्छा। देखउ = देखू - देखद् (दृश्यते ) का सम्भावमा में उत्तम-पुरुष का एक-वचन । मत-भाऊ = सत्य-भाव । उपना= उत्पन्न जत्रा उपनदू