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२११] सुधाकर-चन्द्रिका। ४६१ कोई = कोऽपि। तुम्हारे-दू = तुम्हारे-हौ। मँडफ = मण्डप । बोई = बोअद (वपति) का भूत-काल, स्त्रीलिङ्ग प्रथम-पुरुष का एक-वचन । लंगूर = लाल = पाँछ। सु-राते = सु-रक्त = सुन्दर ललित। जहाँ = वहाँ। निकमि = निकल कर (निःकाश्य)। भाग = भागा। कर-मूहाँ = कर-मुहाँ = काला मुख । बजरागि = वज्राग्नि । जरद जलने। हउँ = मैं । लागा = लगा। बजर-अंग = वज्राङ्ग वज्र-देह ॥ रात्रीन-लंका = रावण-लङ्का । डही = डहदू =दहदू (दहति) का भूत-काल, स्त्रीलिङ्ग प्रथम-पुरुष का एक-वचन । डाढन = डाढने = दाहने = जलाने । श्राइ = आई = श्रावद (श्रआयाति) का भूतकाल, स्त्रीलिङ्ग प्रथम-पुरुष का एक-वचन । घन दू = घन-हो - कठिन-हो। पहार = पहाड प्रहार = पर्वत । रावट = आवर्तन = पिघल कर एक हो जाना = गल कर एक हो जाना राख हो जाना। राखदू =रको (रक्षेत् ) । गहि = गह कर (ग्रहीत्वा)= पकड कर । पादू = पाद = पाव = पैर ॥ वीर हनूमान् जिन्हों ने लङ्का जारा था, उस पर्वत पर रखवाली के लिये रहा करते थे। (वह) वहीं बैठे हुए वहौं से लङ्का को देखा करते हैं और छठएँ छठएँ मास में उठ कर हाँक दिया करते हैं (जिस में लङ्का के राक्षस डरते रह; उत्तर को अोर श्रा कर भारत के लोगों को दुःख न दें)। तिसी की ( रत्न-सेन के चिता को)- आग से फिर वे भी जलने लगे; लङ्का को छोड (कैलास में भगे और वहाँ जा कर जलन को बेदना से ) पलंग के ऊपर जा कर पड गए। उन्हाँ ने वहाँ जा कर जहाँ पार्वती और महादेव थे तहाँ दूस सन्देश को कहा। कि कोई विरही योगी है उस ने (हे महादेव जी) तुम्हारे मण्डप में भाग को दी है। वहाँ पर मेरा सुन्दर ललित लाल जल गया; निकल कर जो भागा तो आग को लवर लग जाने से कर-मुहाँ हो गया। उसी वज्राग्नि से मैं जलने लगा ; वज्राङ्ग ( वज्र के ऐसा अङ्ग) जरते-ही मैं (वहाँ से) उठ कर भागा ॥ रावण को लङ्का को तो मैं ने जलाया और वह (श्राग) मुझे जलाने के लिये आई। (मो) कठोर पहाड पिघल कर राख होता है; कौन (रत्न-सेन के ) पैर को पकड कर, (प्रार्थना कर, इस समय उस बाग से सब के प्राणों को) बचावे ॥२ ११ ॥ इति राजा-रत्न-सेन-सत्खण्डं नामैकविंश-खण्डं समाप्तम् ॥२१॥ - ..