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१६८- १६६] सुधाकर-चन्द्रिका । ४३३ हम ने वे गोपीचन्द और भर्तृहरि तो पिङ्गला नाडौ के लिये अर्थात् योगाभ्यास के लिये कदलीवन में गए, (पर) यह नहीं जानते कि यह योगी सिंहल में किस कारण आया है। ( कदलौ वा कज्जली वन के लिये १३२ दो० को टीका देखो) ॥ अवधूत में ऐसी मूर्ति और ऐसे लक्षण को (आज तक) नहीं देखा ; जानों यह योगी नहीं हैं किसी राजा के पुत्र हैं। (अवधूत के लिये ४७ पृ० ३० वें दोहे की टौका देखो) ॥ १८८ ॥ चउपाई। सुनि सो बात रानी रथ चढौ। कहँ अस जोगि जो देखउँ मढौ ॥ लैइ सँग सखौ कौन्ह तह फेरा। जोगिन्छ आइ आछरिन्ह घेरा ॥ नयन कचूर पेम-मद भरे। भइ सो दिसिटि जोगी सउँ ढरे ॥ जोगिहि दिसिटि दिसिटि सउँलौन्हा । नयन रूप नयनहिँ जिउ दोन्हा ॥ जो मद चहत परा तेहि पाल । सुधि न रही ओहि एक पिआलइँ॥ परा माँति गोरख कर चेला। जिउ तन छाडि सरग कहँ खेला ॥ फिंगरौ गहे जो हुत बइरागौ। मरतिहिं बार उहइ धुनि लागौ ॥ दोहा। जेहि धंधा जा कर मन लागइ सपनहुँ सूझ सा धंध । तेहि कारन तपसौ तप साधहिँ करहिँ पेम मन बंध ॥ १८६ ॥ सुनि = श्रुत्वा = सुन कर। बात = वार्ता = बात। चढी = चढदू (उच्चलति) का भूत-काल में स्त्रीलिङ्ग का एक-वचन। कहँ = कहाँ = कुत्र । अस = ऐसा = एतादृश । जोगौ = योगी । देखउँ = देख = देखदू का विध्यर्थ में उत्तम-पुरुष का एक वचन । मढी मढ (मठ) का स्त्रीलिङ्ग = छोटा मठ । लदू = ले कर =त्रालाय। संग मखौं = मखियाँ। तह =तहाँ तत्र । फेरा भ्रमण । जोगिन्ह = योगी का बहु-वचन । आद् = एत्य = श्रा कर। श्राछरिन्ह = अकरी (अप्सरा) का बहु-वचन । घेरा = घरदू (घसते, घणि ग्रहणे भ्वादि) का भूत-काल । नयन = नेत्र । कचूर = कर = एक विष जो हरदी में उत्पन्न होता है और जिस का रंग प्रायः हरदी हो के ऐसा होता है। पेम = प्रेम । मद = मद्य = मदिरा । भरे = भरद् (भरति) का भूत-काल में बहु-वचन । साथ । 55