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१६० - १६१] सुधाकर चन्द्रिका। ४१७

चाल से चलौं (भौतर बाहर सदा काम करते ढोठी हो गई हैं दूस लिये बडौ तेजी से चलती हैं ; मदी का कान काटती हैं)। गठरिओं में फूल ले कर मालिन चलौं; और सिर पर फुलेलों को ले कर तेलिन चलौं । टङ्गार किए बहुत वेश्या चलौं ; जहाँ तक मूंदी कलिया थौँ सब खिल गई, अर्थात् जो जो लडकियाँ घर में सदा बंद रहा करती थौं सब बाहर निकल पडौँ । नटिन, डोमिन, ढोलिन, सहनाई और भेरी बजाने-वालौं (सब) स्त्रियाँ बाजे के आनन्द से नाचतो, विहँसती, और खेलती (चलौं) ॥ कवि दोनों दोहाओं को चौपादों में ब्राह्मणो १। अगरवालिन २। बैसिन ३ । चंदेलिन ४ । चौहान ५ । सानारिन ६ । कलवारिन ७। बनिश्राइन ८। कैथिन । पटदून १० । बरदून ११ । ठठेरिन १२ । अहौरिन १३ । गुजरौ १४ । तँबोलिन १५ । लाहारिन १६ । भाँटिन १७ । गधिन १८ । छोपिन १६ । रंगरेजिन २० । नाउन २ । बारिन २२। मालिन २३ । तेलिन २४ । वेश्या २४ । नटिन २६ । डोमिन २७। ढोलिन २८। सहनादन २७। भरिकारिन (चमादून) ३० । यह तीस जात को स्त्रियों को कहा। दून में वेश्या की कोई जाति न होने से २६ हो जाति हुई शेष ७ जाति ‘जहँ लगि मूंदी बिकसौं कलौं' दूस से समझ लेना चाहिए। आज कल प्रचलित ३६ जाति के लिये पृ० १५५ देखो ॥ १६० ॥ चउपाई। कवल सहाय चलौं फुलवारौ। फर फूलन्छ कइ इच्छा-बारौ ॥ श्रापु आपु मँह करहिं जोहारू। यह बसंत सब कहँ तेवहारू॥ चहइ मनोरा झूमक होई। फर अउ फूल लिएउ सब कोई ॥ फागु खेलि पुनि दाहब होरी। सैंतब खेह उडाउब झोरी॥ आजु साजि पुनि दिवस न दूजा। खेल बसंत लेहु कइ पूजा॥ भा आसु पदुमावति केरा। बहुरि न आइ करब हम फेरा ॥ तस हम कहँ होइहि रखवारी। पुनि हम कहाँ कहाँ यह बारौ ॥ दोहा। पुनि रे चलब घर आपुन पूजि बिसेसर देउ। जेहि का होहइ खेलना आजु खेल हँसि लेउ ॥ १६१ ॥ 53