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३४८ पदुमावति । १६ । सिंघल-दीप-भाउ-खंड । [१६२ - १६६ = लगती है ॥ तिस (बिजलो) के ऊपर जानौँ चन्द्रमा प्रकाश किया है। और (जो) चन्द्रमा है सो कचपचौ को (जानों) गरासता है, अर्थात् खाता है ॥ (कचपची के अतिरिक्त) और नक्षत्रों को (भी) चारो दिशाओं में उजियाली है। (उन को ऐसौ शोभा है, जानों) जगह जगह में दीप के ऐसे ( कोई चमकदार पदार्थ) बारे गये हैं ॥ और दक्षिण दिशा में नगौच-ही सुवर्ण का मेरु (पर्वत) देख पड़ता है। जानाँ वसन्त ऋतु आती है तैसा, जगत् बमता अाता है, अर्थात् आगे सब स्थान ऐसे शोभित है, जानौँ उन स्थानों में वसन्त ऋतु श्रा कर डेरा लगाये है। यह सब पद्मावती-पक्ष में सिंहल को लोला और ब्रह्म-रन्ध में ब्रह्म-रचस्य-कमल को लोला राजा वा योगिराज को देख पडती है, जिस का यथावत् वर्णन अगलौ चौपाइयों से विदित होगा ॥१६२॥ - मछंदर-नाथू॥ चउपाई। तूं राजा जस बिकरम आदौ। तूं हरिचंद बहुनु सत-बादौ ॥ गोपिचंद तुई जीता जोगा। अउ भरथरी न पूज बिनोगा ॥ गोरख सिद्धि दोन्र तोहि हाथू। तारी जौता पेम ते पुहुमि अकास। दिसिटि परा सिंघल कबिलास ॥ वेइ जो मेघ गढ लाग अकासा। बिजुरौ कनइ कोट चहुँ पासा ॥ तेहि पर ससि जो कचपचि भरा। राज-मँदिर सोनइ नग जरा ॥ अउर-उ नखत कहेसि चहुँ पासा। सब रानिह कई आहि अबासा ॥ दोहा। गगन सरोबर ससि कवल तूं रबि जत्रा भवर होइ कुमुद तराई पास। पवन मिला लेइ बास ॥ १६३ ॥

त्वम् । बिकरम = विक्रम, उज्जयिनी का राजा। श्रादौ = श्रादि = प्रथम

पहला । हरिचंद = हरिश्चन्द्र = त्रिशङ्कु का पुत्र = अयोध्या का एक राजा। बद्नु = वैन्य = वेन का पुत्र राजा पृथु, वहिष्मती नगरी का राजा । सत-बादौ = सत्य-वादी सत्य-कहने-वाला = सत्य-वक्ता। गोपिचंद = गोपीचन्द्र = बङ्गाले का एक राजा ( १३२ वे दोहे को टौका देखो)। जीता = जीतद् (जयति) का भूत-काल में एक-वचन ।