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१५१] सुधाकर-चन्द्रिका । ३१७ सातो स्वर्गों के ऊपर चढ कर (उस राह में ) धाऊँ, अर्थात् दौडंगा (तुमारे लोगों के डेरवावने से नहीं डरूँगा)। (मात पाताल और मात स्वर्ग के लिये १ दोहे की टीका देखो ) ॥ पुराणों में कथा है, कि नास्तिकों के कारण जब वेद जहाँ तहाँ छिन्न भिन्न हो गया, तब व्यास जी ने बडे परिश्रम से सर्वत्र से खोज खोज कर यावच्छक्य सब वेदाँ को फिर एकट्ठाँ किया। दूसौ लिये आदर के लिये लोग व्यास को वेद-व्यास कहते हैं और भगवान् के चौबीस अवतारों में १७ वाँ अवतार मानते हैं । कवि ने प्रसिद्ध होने के कारण काढेड क्रिया के कर्ता वेद-व्यास को दोहे में समावेश न होने से छोड दिया है। क्योंकि उस का अध्याहार करना कुछ कठिन नहीं । वेद-व्यास के लिये श्रीमद्भागवत, प्रथम-स्कन्ध, अध्याय ३, श्लोक २१ । 'ततः सप्तदशे जातः सत्यवत्यां पराशरात् । चक्रे वेदतरोः शाखा दृष्ट्वा पुंसोऽल्पमेधसः ॥' ऐना लिखा है ॥ १५१ ॥ - इति वोहित-खण्ड-नाम चतुर्दश-खण्डं समाप्तम् ॥ १४ ॥