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१२६] सुधाकर-चन्द्रिका। २२५ लटकन । मयन = = 1 बन्धन हुत्रा = अनुरागी हुआ। तौवद् = तीव्र = तीक्ष्ण। सरोरू = शरीर। तन-चौरू = तनु-चौर पतला वस्त्र । रतन = रत्न । पाट = पट्ट = रेशम की डोर । झाँपा= झम्पा = झब्बा = मदन = काम-देव । कोपा = कोप किया। करी= कलौ = कलिका। कवनु =क-नु = कौन बासना =वासना = सु-गन्ध । परमल = परिमल = पराग = सु-गन्ध-धूलि । मेद = कस्वरौ। अरघानि = श्राघ्राण के लिये = सूंघने के लिये । बंध = बँधना ॥ जब शक्ति मन्द हो जाती है. तब उस को बढाने के लिये लोग शोधित विष का सेवन करते हैं। इस लिये कवि भी नाभी-कुण्ड के वर्णन में बुद्धि-शक्ति को मन्द देख कर, वेणै-नाग और कटि-ब के वर्णन-व्याज से दोनों विषेले जन्तुओं के शोधित विर्षों का सेवन कर, फिर नाभी-कुण्ड के वर्णन में तत्पर हुआ। सो (जो) नाभी-कुण्ड है (जिस का कुछ वर्णन पहले कर आये हैं, वहाँ) जैसे समुद्र का भौंर घूमा करता है, तैसा-ही मलय का समौर, अर्थात् मलयचन्दन के सु-गन्ध से भरा वायु, भ्रमा करता है। अर्थात् नाभी-कुण्ड में श्रावर्त्त के कारण जो मौढी के ऐसा ऊपर से नीचे तक फेरा पड गया है, उसी में जगत्प्राण-खरूप मलया- निल नौचे ऊपर फिरा करता है ॥ बहुत से ( समुद्र के ) भौंर [ इस नाभि-कुण्ड के मनोहर श्रावन (भौंर ) के देखने के लिये] बवंडर (वात्या) हुए। (परन्तु वहाँ तक ) पहुँच न सके, (अन्त में ) स्वर्ग को (चले ) गये, अर्थात् बिलाय गये। यह कवि को उत्प्रेक्षा है॥ (उस नाभी को ऐसौ शोभा है, जानौँ ) चन्दन के बीच में हरिणी (कुरंगिन ) के जाने का चिन्ह है, अर्थात् चन्दन के बीच में हो कर, जो हरिणी गई है, उस के खुर का चिन्ह है। (चन्दन-मय पद्मावती का उदर उस में खुर-चिन्ह-रूप नाभौ है) वा नाभी में कस्तुरी का विशेष सु-गन्ध होने से विश्वास होता है, कि दूस में से हो कर हरिणी गई है, जिस के मृग-मद का सु-गन्ध इस द्वार से निकल रहा है। (सो) देखें कौन (उस पद्मावती के उदर के ऊपर विहार करने-हारी मनो-हारिणी हरिणी को, जो कि पद्मावती के नेत्रों में वा नाभी द्वारा हृदय में था बमो है) पाता है, (और) कौन राजा भोज (के ऐसा भाग्यवान् ) है, (जिसे संसार के सभी पदार्थ सु-लभ थे ) ॥ (देखें) कौन उस (कुरंगिन) के लिये हिमालय में (तपस्या कर के ) मौझा है, किस के (भाग्य में यह कुरंगिन ) लिखी है, और कौन ऐसा रौझा (प्रेमी) है, (जिम के प्रेम से मोहित हो कर, स्वयं यह हरिणौ मिलने की चाह प्रगट करे)।