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नैषध-चरित-चर्चा

भावार्थ—इस दमयंती का कोई अनिर्वचनीय अंग (अर्थात् जिसका नाम नहीं लिया जा सकता) क्या पीपल के पत्ते को, उसे जीतने के लिये, ढूँढ़ रहा है ? हमारा तर्क ठीक जान पड़ता है; क्योंकि, यदि ऐसा न होता, तो पीपल के पत्ते को, और वृक्षों के पत्तों से अधिक, किसके भय से इतना कंप छूटता ? अपने से अधिक बलवान् शत्रु जब पीछा करता है, तभी मनुष्य अथवा अन्य जीव भय-वश काँपने लगते हैं— यह भाव ।

पीपल के पत्ते वायु से अधिक हिलते हैं। उनके हिलने पर महाकवि ने यह महाकल्पना सोची है।

दमयंती के सम्मुख जब नल अकस्मात् प्रकट हुआ, तब दमयंती और उसकी सहेलियाँ चकित होकर घबरा गईं। अपने- अपने आसन से वे उठ बैठी और कर्तव्य-विमूढ़ होकर एक दूसरे को ओर देखने लगी कि यह कौन है और कहाँ से अचा- नक इस प्रकार अंतःपुर में चला आया। कुछ देर बाद हृदय को कड़ा करके दमयंती ने स्वयं ही पूछ-पाछ प्रारंभ की—

पुरा परित्यज्य मयात्यसर्जि
स्वमासनं तत्विमिति क्षणन्न ;
अनर्हमप्येतदलङ्क्रियेत
प्रयातुमीहा यदि चान्यतोऽपि ।

(सर्ग ८, श्लोक २३)
 

भावार्थ—आपको देखते ही उठकर मैंने अपना आसन जो