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नैषध-चरित-चर्चा

के यहाँ जन्म लिया। उसकी महिमा का विचार करके जन्म नहीं लिया। सती की तो यह दशा हुई; शंकर की उससे भी विशेष । उनके मस्तक पर, जिसे लोग तीसरा नेत्र कहते हैं, वह नेत्र नहीं है, किंतु ब्रह्मदेव का लिखा हुआ सती का प्रज्वलित विरह है।

जो जल जाता है, उसे शीतल वस्तु का आश्रय लेना ही पड़ता है। सतीजी शंकर के वियोग से अत्यंत संतप्त हो रही थीं। इसीलिये, हिममंडित शिखरधारी हिमालय के यहाँ अपनी वियोगाग्नि शीतल करने ही के लिये उन्होंने जन्म लिया— यह भाव ।

दहनजा न पृथुर्दवथुव्यथा
विरहजैव पृथुर्यदि नेदृशम् ।
दहनमाशु विशन्ति कथं स्त्रियः
प्रियमपासुमुपासितुमुद्धराः।

(सर्ग ४, श्लोक ४६)
 

भावार्थ—अग्नि से उत्पन्न हुई दाह-व्यथा कोई व्यथा नहीं कहलाती । वियोगाग्नि से उत्पन्न हुई व्यथा ही उत्कट व्यथा है। यदि ऐसा न होता, तो स्त्रियाँ मृतक पति के साथ, किसी को भी परवा न करके, प्रत्यक्ष अग्नि में क्यों प्रवेश कर जातीं ?

श्रीहर्षजी की कल्पनाएँ देखीं ? कैसे आकाश-पाताल एक कर देती हैं।