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श्रीहर्ष-विषयक कुछ बातें

अच्छा, अब आदि-शूर राजा के यहाँ श्रीहर्ष नाम के पंडित के जाने की कहानी सुनिए। उसके यहाँ जब श्रीहर्ष पहुँचे हैं, तब जैसे इनके साथ गए हुए और-और पंडितों ने अपना-अपना परिचय दिया, वैसे ही इन्होंने भी दिया। इनका परिचायक श्लोक रहस्य-संदर्भ-नामक ग्रंथ से हम नीचे उद्धृत करते हैं—

नाम्नाहं श्रीलहर्षः क्षितिपवर! भरद्वाजगोत्रः पवित्रो
नित्यं गोविन्दपादाम्बुजयुगहृदयः सर्वतीर्थावगाही;
चत्वारः सांगवेदा मम मुखपुरतः पश्य पाणौ धनुर्मे
सर्व कर्तु क्षमोऽस्मि प्रकटय नृपते! त्वन्मनोऽभीष्टमाशु।

कलकत्ता-निवासी श्रीयुत रघुनाथ वेदांतवागीश ने स्वरचित श्रीकृष्णककारादि-नामक भाष्य की भूमिका में अपने को श्रीहर्ष का वंशज बताया है और श्रीहर्ष की स्तुति में एक श्लोक भी दिया है। यथा—

वेदान्तसिद्धान्तसुनिश्चयार्थो दीक्षाक्षमादानदयार्द्रचित्तः।
परात्मविद्यार्णवकर्णधारः श्रीहर्षनामा भुवनं तुतोष।

इन दो श्लोकों को देखने से जान पड़ता है कि यह श्रीहर्षजी वेदांत-विद्या में परम निष्णात थे तथा दर्शन-शास्त्र के भी उत्कृष्ट वेत्ता थे। पर यह श्रीहर्ष नैषध-चरित के कर्ता श्रीहर्ष नहीं हो सकते। जो श्रीहर्ष आदि-शूर के यहाँ गए थे, वह भारद्वाज गोत्र के थे। नैषध-चरित के कर्ता तो उस समय पैदा ही न हुए थे। फिर यदि मीराँसराय के मिश्रों का कथन माना जाय, तो उनके पूर्वज