पृष्ठ:नैषध-चरित-चर्चा.djvu/१०४

यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
१०३
श्रीहर्ष की कविता के नमूने

स्मरण रहे, दमयंती यह सब नल ही से कह रही है। इस कथन में यह सबसे बड़ी विशेषता है।

प्रतिज्ञा के अनंतर दमयंती ने नल की प्राप्ति के विषय में अतीव औरसुक्य और अतीव अधैर्य प्रकट किया। उसने कहा—

"स्वयंवर होने में एक ही दिन शेष है। परंतु मेरे प्राणों का अंत इस एक दिन के अंत होने के पहले ही होना चाहता है । अतएव मेरे ऊपर दया करके आप एक दिन यहीं ठहर जाइए, जिससे आपको देख-देखकर किसी प्रकार मैं यह एक दिन काटने में समर्थ हो जाऊँ । मैं आपको इसलिये ठहराना चाहती हूँ कि उस हंस ने अपने पद के नखों से पृथ्वी पर मेरे प्रियतम का जो चित्र खींचा था, वह आपसे बहुत कुछ मिलता है। अतएव जब तक मुझे मेरे प्रियतम के दर्शन नहीं होते, तब तक उसके सदृश आपको देखकर ही किसी तरह मैं अपने प्राण रखना चाहती हूँ।"

इस अलौकिक अनुराग को देख और इस सुदृढ़ प्रतिज्ञा को सुनकर भी, दूतत्व धर्म से अणु-मात्र भी विचलित न होकर, नल अपनी ही गाते रहे और बार-बार यही सिद्ध करते गए कि मनुष्य को छोड़ देवतों से ही संबंध करने में तुम्हारी भलाई है। जब दमयंती ने किसी प्रकार उनके उपदेश को न माना, तब आपने उसे बिभीषिका दिखाना प्रारंभ किया। नल ने कहा कि यदि वरुण और अग्नि तुम्हारे विरुद्ध हो जायँगे, तो जल और अग्नि के विना तुम्हारा पिता कन्यादान ही न कर सकेगा । यदि