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निर्मला ९६

ही प्रिय पुत्र को अपना शत्रु समझने लगे, उसको निर्वासन देने पर तैयार हो गए ! निर्मला पुत्र और पिता के बीच में दीवार को भाँति खड़ी थी। निर्मला को अपनी ओर खींचने के लिए पीछे हटना पड़ता था, और पिता तथा पुत्र में अन्तर बढ़ता जाता था। फलतः आज यह दशा हो गई है कि अपने अभिन्न पुत्र से उन्हें इतना छल करना पड़ रहा है! आज बहुत सोचने के बाद उन्हें एक ऐसी युक्ति सूझी है,जिससे उन्हें आशा हो रही है कि वह निर्मला को बीच से निकाल कर अपने दूसरे बाजू को अपनी तरफ कर लेंगे। उन्होंने उस युक्ति का प्रारम्भ भी कर दिया है, लेकिन इससे अभीष्ट सिद्ध होगा या नहीं, इसे कौन जानता है?

जिस दिन से तोताराम ने निर्मला के बहुत मिन्नत-समायत करने पर भी मन्साराम को बोर्डिङ्ग हाउस में भेजने का निश्चय, किया था,उसी दिन से उसने मन्साराम से पढ़ना छोड़ दिया था। यहाँ तक कि बोलती भी न थी। उसे स्वामी की इस अविश्वासपूर्ण तत्परता का कुछ-कुछ आभास हो गया था। उन्फोह! इतना शक्की मिजाज! ईश्वर ही इस घर में लाज रक्खें! इनके मन में ऐसी-ऐसी दुर्भावनाएँ भरी हुई हैं! मुझे यह इतनी गई गुज़री समझते हैं। ये बातें सोच-सोच कर वह कई दिन रोती रही! तब उसने सोचना शुरू किया, इन्हें क्यों ऐसा सन्देह हो रहा है। मुझमें ऐसी कौन सी बात है, जो इनकी आँखों में खटकती है। बहुत सोचने पर भी उसे अपने में कोई ऐसी बात नज़र न आई। तो क्या उसका मन्साराम से पढ़ना, उससे हँसना-बोलना ही इनके