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तीसरा परिच्छेद
 


भाल०--तीन सेर तो वह अपने मुँह से कह रहा है। चार सेर से कम न खाया होगा, पही तोल!

रँगीली--पेट में शनीचर है क्या?

भाल०--आज और रह गया, तो छ: सेर पर हाथ फेरेगा।

रँगीली--तो आज रहे ही क्यों, खत का जवाब जो देना हो, देकर विदा करो। अगर रहे, तो साफ कह देना कि हमारे यहाँ मिठाई मुफ्त नहीं आती। खिचड़ी बनाना हो बनाएँ, नहीं अपनी राह लें। जिन्हे ऐसे पेटुओं को खिलाने से मुक्ति मिलती हो, वे खिलाएँ; हमें ऐसी मुक्ति न चाहिए।

मगर पण्डित जी विदा होने को तैयार बैठे थे। इसलिए बाबू साहब को कौशल से काम लेने की जरूरत न पड़ी।

पूछा--क्या तैयारी कर दी महाराज?

मोटे०--हाँ सरकार,अब चलेगा? नौ वजे की गाड़ी मिलेगीन?

भाल०--भला आज तो और रहिए!

यह कहते-कहते वाबू जी को भय हुआ कि कही यह महाराज सचमुच न रह जाएँ, इसलिए उस वाक्य को यों पूरा किया--हाँ, वहाँ लोग आप का इन्तज़ार कर रहे होंगे।

मोटे०--एक-दो दिन की तो बात न थी; और विचार भी यही था कि त्रिवेणी का स्नान करूँगा; पर बुरा न मानिए तो कहूँ--आप लोगों में ब्राह्मणों के प्रति लेशमात्र भी श्रद्धा नहीं है। हमारे यजमान हैं, जो हमारा मुँह जोहते रहते हैं कि पण्डित जी कोई आज्ञा दें, तो उसका पालन करें। हम उनके द्वार पर पहुँच जाते