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तीसरा परिच्छेद
 


देख रहे हैं कि एक महाशय दूर से थके-माँदे चले आ रहे हैं; पर किसी को जरा भी परवाह नहीं। लाओ पानी-वानी रक्खो। पण्डित जी, आपके लिए शर्वत बनवाऊँ या फलहारी मिठाई मँगवा दूँ।

मोटेराम जी मिठाइयों के विषय में किसी प्रकार का बन्धन न स्वीकार करते थे। उनका सिद्धान्त था कि घृत से सभी वस्तुएँ पवित्र हो जाती हैं। रसगुल्ले और बेसन के लड्डू उन्हें बहुत प्रिय थे; पर शर्वत से उन्हें रुचि न थी। पानी से पेट भरना उनके नियम के विरुद्ध था। सकुचाते हुए बोले--शर्वत पीने की तो मुझे आदत नहीं, मिठाई खा लूँगा।

भाल०--फलाहारी न?

मोटे--इसका मुझे कोई विचार नहीं।

भाल०--है तो यही बात। छूतछात सब ढकोसला है। मैं स्वयं नहीं मानता। अरे, अभी तक कोई नहीं आया। छकौड़ी, भवानी, गुरदीन, रामगुलाम कोई तो बोले।

अब की भी वही बूढ़ा कहार खाँसता हुआ आकर खड़ा हो गया, और बोला--सरकार, मोर तलव दे दीन जाय। ऐसी नौकरी मोसे न होई। कहाँ लो दौरी, दौरत-दौरत गोड़ पिराय लगत हैं।

भाल०--काम कुछ करो या न करो; पर तलव पहले चाहिए। दिन भर पड़े-पड़े खाँसा करो, तलब तो तुम्हारी चढ़ ही रही है। जाकर बाजार से एक आने की कोई ताजी मिठाई ला। दौड़ता हुआ जा!