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सत्ताईसवाँ परिच्छेद

क महीमा और गुज़र गया। सुधा अपने देवर के साथ तीसरे ही दिन चली गई। अब निर्मला अकेली थी। पहले हँस-बोल कर जी बहला लिया करती थी। अब रोना ही एक काम रह गया। उसका स्वास्थ्य दिन-दिन बिगड़ता गया। पुराने मकान का किराया अधिक था। दूसरा मकान थोड़े किराए का लिया। यह एक तङ्ग गली में था। अन्दर एक कमरा था;और छोटा सा आँगन। न प्रकाश जाता,न वायु! दुर्गन्ध उड़ा करती थी। भोजन का यह हाल कि पैसे रहते हुए भी कभी-कभी उपवास करना पड़ता था। बाजार से लावे कौन? फिर अब घर में कोई मर्द नहीं,कोई लड़का नहीं,तो रोज भोजन बनाने का कष्ट कौन उठावे। औरतों के लिए रोज़ भोजन करने की आवश्यकता ही क्या? अगर एक वक्त खा लिया,तो दो दिन के लिए छुट्टी हो गई। बच्ची के लिए ताजा हलुवा या रोटियाँ बन जाती थीं। ऐसी दशा में स्वास्थ्य क्यों न बिगड़ता? चिन्ता,