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छब्बीसवां परिच्छेद


र्मला दिन भर चारपाई पर पड़ी रही। मालूम होता है,उसकी देह में प्राण ही नहीं है। न स्नान किया,न भोजन करने उठी। सन्ध्या समय उसे ज्वर हो आया। रात भर देह तवे की भाँति तपती रही। दूसरे दिन भी ज्वर न उतरा। हाँ,कुछ-कुछ कम हो गया था। वह चारपाई पर लेटी हुई निश्चल नेत्रों से द्वार की ओर ताक रही थी। चारों ओर शून्य था,अन्दर भी शून्य,बाहर भी शून्य। कोई चिन्ता न थी,न कोई स्मृति,न कोई दुख! मस्तिष्क में स्पन्दन की शक्ति ही न रही थी।

सहसा सक्मिणी वच्ची को गोद में लिए आकर खड़ी हो गई। निर्मला ने पूछा-क्या यह बहुत रोती थी?

सक्मिणी-नहीं,यह तो मिनकी तक नहीं। रात भर चुपचाप पड़ी रही। सुधा ने थोड़ा सा दूध भेज दिया था,वही पिला दिया था।