यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
निर्मला
२३२
 

रही थी, रुक्मिणी उसे धीरज दिला रही थी, लेकिन उसके आँसू न थमते थे! शोक की ज्वाला कम न होती थी।

तीन बजे जियाराम स्कूल से लौटा। निर्मला उसके आने की खबर पाकर विक्षिप्त की भाँति उठी; और उसके कमरे के द्वार पर बोली-भैया, दिल्लगी की हो तो दे दो। दुखिया को सता कर क्या पाओगे?

जियारास एक क्षण के लिए कातर हो उठा। चौर-कला में उसका यह पहला ही प्रयास था। वह कठोरता जिसे हिंसा में मनोरंजन होता है, अभी तक उसे प्राप्त न हुई थी। यदि उसके पास सन्दूकचा होता; और उसे फिर इतना मौका मिलता कि उसे उसी ताक पर रख आवे, तो कदाचित् वह उस मौके को न छोड़ता; लेकिन सन्दूकचा उसके हाथ से निकल चुका था। यारों ने उसे सराफे में पहुंचा दिया था; और औने-पौने बेच भी डाला था। चोरी की झूठ के सिवा और कौन रक्षा कर सकता है।बोला-भला, अम्माँ जी, मैं आपसे ऐसी दिल्लगी करूँगा। आप अभी तक मुझ पर शक करती जा रही हैं। मैं कह चुका कि मैं रात को घर पर न था; लेकिन आपको यकीन ही नहीं आता! बड़े दुख की बात है कि आप मुझे इतना नीच समझती हैं।

निर्मला ने आँसू पोंछते हुए कहा-मैं तुम्हारे ऊपर शक नहीं करती; भैया! तुम्हें चोरी नहीं लगाती । मैंने समझा शायद दिल्लगी की हो!

जियाराम' पर वह चोरी का सन्देह कैसे कर सकती-थी? दुनिया यही तो कहेगी कि लड़के की माँ मर गई है, तो उस पर