पृष्ठ:निबन्ध-नवनीत.djvu/६८

यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
(३८)

स्टुपिड, खाने में रेविल, कमाने में टेक्स । कहां तक इस टिटिल-टेटिल (घकवाद) को पढावें, कोई बडी डिक्शनरी (शब्द-कोप) को लेके ऐसे शब्द दहिए, जिनमें 'टकार' न हो तो बहुत ही कम पाइएगा ! उनके यहां 'ट' इतना प्रविष्ट है। कि तोता कहाइए तो टोटा फहेंगे। इसी 'टकार के प्रभाव से नीति में सारे जगत् के मुकुट-मणि हो रहे हैं। उनकी पालिसी समझना तो दरकिनार, किसी साधारण पढ़े लिखे से पालिसी के माने पूछो तो एक शब्द ठीक ठीक न सममा सकेगा।

इससे बढके नीतिनिपुणता क्या होगी कि रुजगार में व्यवहार में, कचहरी में, दरवार में, जीत में, हार में, पैर में, प्यार में, लल्ला के सिवा दहा जानते ही नहीं ! रीझेंगे तो भी जियाफत लेंगे, नजर लेंगे, तुहफा लेंगे, सौगात लेंगे, और इन सैकडो हज़ारों के बदले देंगे क्या, 'श्रीईसाई' (सी० एस० पाई० ) की पदवी, या एक कागज के टुकडे पर सार्टिफिकेट, अथवा कोरी थैफ, (धन्यवाद ) जिसे उर्दू में लिखो तो ठेग अर्थात् हाथ का अगूठा पढा जाय धन्य री खार्थसाधकता! तभी तो सौदागरी करने आए, राजाधिराज यन गए । क्यों न हो, जिनके यहां यात २ पर 'टकार' मरी हे उनका सर्वदा सर्वभावेन सब किसी का सब कुछ डकार जाना क्या आश्चर्य है ! नीति इसी का नाम है, 'टकार' का यही गुण है कि जब सारी लक्ष्मी विलायत दो ले गए तय भारतीय लोगों की कुछ कुछ आखें पुली हैं। पर अभी यहुन कुछ करना है। पहिले अच्छी तरह प्रास्में स्त्रोल के देखना चाहिए कि यह अक्षर जैसे अंगरेजो के यहां से ही हमारे यहां भी है, पर भेद इतना है कि उनकी "टी" की सूरत ठीक एक