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'ट'।

है इस अक्षर में न तो 'लकार' का सालालित्य है,न'दकार' फा सा दुरूहत्व, म 'मकार का सा ममत्व बोधक गुण है, पर विचार कर के देखिए तो शुद्ध स्वार्थपरता से भरा हुवा सूक्ष्म विचारके देखो तो फारस और अरय की ओर के लोग निरे छल के रूप, कपट की मूरत नहीं होते, अप्रसन्न होके मरना मारना जानते हैं, जयग्दस्त होने पर निर्बलों को मन- मानी रीति पर सताना जानते हैं, यडे प्रसन्न हो तो तन, मन, धन से सहाय करना जानते हैं, जहा और कोई युक्तिन चले पहा निरी खुशामद करना जानते हैं, पर अपने रूप में किसी तरह का पट्टान लगने देना और रसाइन के साथ धीरे घीरे हसा खिलाके अपना मतलय गांठना, जो नीति का जीव है, उसे बिलकुल नहीं जानते ।

इतिहास लेके सब बादशाहो का चरित्र देख डालिए । ऐसा कोई न मिलेगा जिसकी भली या धुरी मनोगति बहुत दिन तक छिपी रह सकी हो। यही कारण है कि उनकी पर्ण- माला में स्वर्ग हई नहीं। किसी फारसी से टट्टी कहलाइए तो मुह थीस कोने का यनावेगा, पर कहेगा तत्ती। रट्टी की बोट में शिकार करना जानते ही नहीं, उन विचारों के यहा 'टहा का प्रक्षर कहा से आये। इधर दमारे गौरागदेव को देखिए । शिरपर हैट, तन पर कोट, पावों में प्येट, और यूट, ईश्वर का नाम पाल्माइटी, (सर्वशक्तिमान) गुरू का नाम ट्यूटर मास्टर (स्वामी को भी कहते हैं) या टीचर, जिसमे प्रीति हो रसकी पदयी मिस्ट्रेस, रोजगार स नाम ट्रेड, नफा फा नाम येनीफिट, कवि का माम पोयट, मूर्य का नाम 1