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जाय। दर्शकों में प्रतापनारायण भी उपस्थित थे।आप सडे हो. कर बोल उठे-"अरे देया रे दैया । मरेउ पर छाती नापी जाई"!

सुनते हैं ये सांस बन्द करके घन्टों तक मुर्दा से पडे रहते थे। जिस अङ्क फो चाहते थे (यथा एक कान या दोनों) उसे ये यथेच्छ हिलाते या फरफाते थे। ऐसा करने में और खङ्ग स्थिर रहते थे। इससे किसी किसी का मत है कि ये योगविद्या जानते थे। पर प्रतापनारायण के ऐसे आहार- विहार करनेवाले का योगी हाना कुछ असम्भव सा जान पड़ता है।

निदान प्रतापनारायण स्वतन्त्र थे, फक्कड थे, हिन्दी और हिन्दुस्तान और काग्रेस के परम भक्त थे, अच्छे कवि, लेखक और उत्साही थे, प्रारब्ध ने इनको अधिक नहीं जीने दिया, नहीं तो इनसे समाज को अनेक लाभ पहुचने की आशा थी।

हिन्दी की हिमायत ।

यह कहने की जरूरत नही कि ये हिन्दी के बहुत बड़े हिमायती थे। हिन्दी के पक्ष में इन्होंने "ब्राह्मण" में यहुत दफे अच्छे अच्छे लेख लियखे एक दफा "फतेहगढ-पंच" ने इनकी हिमायत के खिलाफ कुछ लिया और हिन्दी में दोपोद्भावना की। इस पर प्रतापनारायण जामे से बाहर हो गये। आपने "पच' की दलीलो वदो ही योग्यता से खण्डन किया। कई महीने तक या विवाद जारी रहा और प्रतापनारायण "पच" की वे-मिर पर सी बाता की, अमारता दिखलाते रहे। हिन्दी के विषय में, का उपदेश यह था--