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कांग्रेस की जय।

श्रीयुत भीमजी जिस समय प्रयागराज में आकर सुशो- मित दुप थे, इस धापर को प्रेमपूर्ण होके कई येर उच्चारण किया था। काग्रेस के मध्य में भी सैकडों सज्जनों के से यही मत्र उच्चरित हुवा था, और अत में इलाहाबाद स्टेशन पर तो यह शब्द आफाश को भेद गए थे। अहाहा आजतक हमारे कानों और मानों में यही ध्वनि गूज रही है, और रहरह- के मुह से यही निकलता है कि 'काग्रेस की जय' ।क्यों न हो, काम साक्षात् दुर्गाजी का रूप है, क्योंकि यह देशहितपी देवप्रकृति के लोगों को स्नेहशक्ति से थाविर्भूत हुई है, "देवाना दिव्य गुण विशिधाना, तेजोगशिसमुद्भवा' है। फिर, हम जाह्मण होके इसकी जय क्यों न बोलें। प्रत्यक्ष प्रभाव यही देख लीजिए कि इसके द्वेपियों ने अपनी सामर्थ्यभर झूठ प्रपंच, छल-कपट कोई पात उठा न रक्स्नी थी, पर-

जस जस सुरसा बदन बढाचा, तासुदुगुण फपि रूप दिखाया। अत में 'सत्यमेव जयते' इस घेदवाक्य के अनुसार कांग्रेस का अधिवेशन हुवा, और ऐसा हुवा जैसी आशा न थी। स्वयं कार्याध्यक्ष लोग कहते थे कि हमने समझा था पडी हद हजार डेलीगेट आयेंगे, उसके टौर पर डेढ हजार मौजूद हैं। धन्य है, लोग समझे थे कि मुसलमान उसमें फभी न शरीक होंगे, सो एक से एफप्रतिष्ठित विद्वान,धनिक.मुसलमान, अनु- मान तीन सौ पिराजमान थे। बरंच बाजे २ नगरों से हिन्दुओं की अपेक्षा मुसलमान ही अधिक आए थे! मला इन बातों को आंखों देखके पा विश्वासपात्रों से सुनके कौन न कह उठेगा कि "काग्रेस की जय। सच तो यह है फि तीर्थराज

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