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अयोध्या

भारतवर्ष में इस समय कितने ऐसे धर्म्मप्रचारक वा धर्म्म- प्रेमी महापुरुष हैं, जो इस बात का विचार करते हैं कि जिस काशी नगरी में बौद्ध चीनी यात्री ने सौ फुट सुवर्ण का शिवलिंग देखा था, वह अब कहाँ गया? उसकी अब क्या दशा है? विद्यापीठ वाराणसी में पुराने शिवलिंगों की आजकल कैसी प्रतिष्ठा वा पूजा हो रही है? जिस मथुरा से महमूद गजनवी ने सोने चाँदी की खंडित मूर्तियों से अनेक ऊँट भरे थे, इस समय वहाँ कितनी सुवर्ण की मूर्तियाँ विद्यमान हैं? अँगरेजों के ज्वलंत प्रताप में, इस शांति के समय में, हमने अपनी पुरियों की कितनी श्रीवृद्धि की है? क्या इसका कभी किसी धर्म्मसभा ने लेखा लगाया है? हमारी भी विचित्र दशा है! हमें जर्मनी, फ्रांस की सब बातें याद हैं, पर यह ज्ञात नहीं कि अयोध्या, मथुरा आदि पुरियों में क्या है। अँगरेजों की देखादेखी हम "सृष्टि कब हुई" इस प्रश्न की आलोचना करने लग गए, किंतु यह खबर नहीं कि अयोध्या आदि पुरियाँ कब और किसने प्रतिष्ठित की थीं। शेक्सपियर और गोल्डस्मिथ के नाटक और काव्य के अनुवाद करने को हम मरते हैं, पर यह नहीं जानते कि हमारी संस्कृत भाषा में रामायण रघुवंश आदि अनेक उपादेय सरस काव्य वर्तमान हैं। इटली के प्रसिद्ध पाम्पे नगर की बरबादी पर हम लेख लिखकर आँसू बहा रहे हैं, परंतु अपनी पुरानी राजधानी अयोध्या, मथुरा की ओर ताकते भी नहीं कि वहाँ क्या था और क्या हो गया।

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