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पुरानी हिंदी

(कन्नौज) को मानो भूगोल का केंद्र माना है, कहा है दूरी की नाप महोदय से ही की जानी चाहिए, पुराने आचार्यों के अनुसार अंतर्वेदी से नहीं । इस महोदय की केंद्रता को ध्यान में रखकर उसका बताया हुआ राजा के कविसमाज का निवेश बड़ा चमत्कार दिखाता है। वह कहता है कि राजा कविसमाज के मध्य में बैठे, उत्तर को संस्कृत के कवि ( कश्मीर, पांचाल), पूर्व को प्राकृत ( मागधी की भूमि मगध ), पश्चिम को अपभ्रंश ( दक्षिणी पंजाब और मरुदेश ) और दक्षिण को भूतभाषा ( उज्जैन, मालवा) आदि के कवि बैठे है। माना राजा का कविसमाज भौगोलिक भाषानिवेश का मानचित्र हुआ । में कुरुक्षेत्र से प्रयाग तक अंतर्वेद, पांचाल और शूरसेन, और इधर मरु, अवंती, पारियात्र और दशपुर-शौरसेनी और भूतभाषा के स्थान थे।

अपभ्रंश

बाँध से बचे हुए पानी की धाराएँ मिलकर अब नदी का

रूप धारण कर रही थीं । उनमें देशी की धाराएँ भी आकर


  • विनशनप्रयागयोगडायमुनयोश्चातरमंतर्वेदी । तदपेक्षया दिशो विभजेत इत्याचार्याः ।तत्रापि महोदय मूनमवधीकृत्य इति यायावरः।

(काव्यमीमांसा पृ०६४)

काव्यमीमांसा, पृ. ५४-५५ ।