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निबंध-रत्नावली

गए हैं और चकवा-चकवी की तरह साथ रहनेवाले प्रेमियों को ढोला-मारू । पीछे वैयाकरणों ने इस प्रेममय शब्द को प्राकृत के दुरनहो और संस्कृत दुर्लभ और हिन्दी दुलह से मिलाकर अपना काम किया है । इसमें संदेह नहीं कि 'डोला राय को 'दुर्लभराय' का विकृत रूप मानना पड़ेगा, परन्तु अत्यासक्त प्रेमी का अर्थ न दुर्लभ में है न दुलह में; ढोला में जो वह आया है बह उस विशेष व्यक्ति के गुणों का जातिमात्र में आरोप होने से हुआ।

ऐसे उदाहरण पचासों दिए जा सकते हैं। भाषाविज्ञान के प्राचार्यों ने यह उदाहरण दिया है । किसी वस्तु का नाम 'हरा' था और उसका यह डिस्थ कपित्थ की तरह अनर्थक नाम था । उसमें हरा ( हरित ) गुण भी था। अब लोगों का जो चीज हरी दिखाई पड़ती उसे वे सादृश्य के कारण “हरा ! हरा !!" चिल्लाने लगे। होत होते हरित गुण की वस्तु मात्र का साधा- रण नाम हरा हो गया जो एक विशेष अनर्थक नाम से निकल कर गुणवाचक हो गया।

यही 'कुशीलव' के साथ हुआ होगा। अयोध्यावासियों के इतिहास में अपने राजा की खोई हुई रानी और पुत्रों का मिलना बड़ी भारी हलचल पैदा करनेवाली घटना हुई होगी। राम ने "लोक एव जानाति किमपि" कहकर सारा पुण्य-पाप का भार प्रजा पर रख दिया था । राम के छोटे भाई अपने अग्रज की नि:संतानता पर दु:खी थे जैसा भवभूति ने चंद्रकेतु और सुमंत