पृष्ठ:निबंध-रत्नावली.djvu/२१६

यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
१७६
निबंध-रत्नावली

तो आँखों से मोतिय का हार झलककर उसके केशों पर बिखर गया। यह मोतियों का हार इस चित्र में क्या सुहावना लगता है !

(१२) सीताजी अयोध्या में अपने महल की सीढ़ियों पर खड़ी हैं, और लक्ष्मणजी धनुष-बाण कंधे पर रखे, सर झुकाए हाथ जोड़े पास खड़े हैं, इनके चरणों की ओर देख रहे हैं, और सीताजी के मनोरंजक वाक्य और आज्ञा को सुन रहे हैं।

(१३) जंगल बियाबान (निर्जतुक) है। लंबे लंबे पेड़ खड़े हैं । कोई सुखे हैं कोई हरे । सत्यवान्जी कंधे पर कुल्हाड़ारखे आगे आगे जा रहे हैं। देवी सावित्री पीछे पीछे जा रही है । एक जगह दोनों बैठ गए हैं। वे इनको देखती हैं, ये उनको देखते हैं। वे उनकी गोद में और ये इनकी गोद में लेट रहे हैं।

(१४) नदी पर एक एकांत स्थान में बहुत सी कन्याएँ, स्त्रियाँ, देवियाँ स्नान कर रही हैं । शुकदेव जी पास से गुजर रहे हैं। उनको कोई भय नहीं हुआ । वे वैसे की वैसे खुल्लमखुल्ला नंगी नहा रही हैं। नदी का जल मारे आनंद के कूद रहा है । ये उछल रही हैं।

(१५) वह राजबालक ध्रुव, ताड़ी (समाधि ) बाँधे जंगल में शेरों के मुख में अपने हाथ को दे रहा है, खेल कर रहा है। प्रतीत होता है लड़ रहा है।

(१६) छोटे छोटे बहुत से बच्चे बैठे हैं, पुस्तक हाथ में है और पढ़ रहे हैं, काँय काँय हो रही है।