पृष्ठ:निबंध-रत्नावली.djvu/१५१

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सच्ची वीरता १९१ कायर पुरुष कहते हैं-"आगे बढ़ चलो।" वीर कहते हैं-“पीछे हटे चलो।" कायर कहते हैं-"उठाश्रो तल- वार ।' वीर कहते हैं - "सिर आगे करो।" वीर का जीवन प्रकृति ने अपनी शक्तियों को फजूल खो देने के लिये नहीं बनाया है। वीर पुरुष का शरीर कुदरत की कुल ताकतों का भंडार है। कुदरत का यह मरकज हिल नहीं सकता । सूर्य का चक्कर हिल जाय तो हिल जाय परंतु वीर के दिल में जो देवी केंद्र है वह अचल है । कुदरत के और पदार्थों की पालिसी चाह आगे बढ़ने की हो, अर्थात् अपने बल को नष्ट करने की हो, मगर वीरों की पालिसी बल को हर तरह इकट्ठा करने और बढ़ाने की होती है। वीर तो अपने अंदर ही 'मार्च करते हैं ; क्योंकि हृदयाकाश के केंद्र में खड़े होकर वे कुल संसार का हिला सकते हैं। बेचारी मरियम का लाडला, खूबसूरत जवान, अपने मद में मतवाला और अपने आपको शाहंशाह हकीकी कहनेवाला ईसा मसीह क्या उस समय कमजोर मालूम होता है जब भारी सलीब पर उठकर कभी गिरता, कभी जख्मी होता और कभी बेहोश हो जाता है ? काई पत्थर मारता है, कोई ढेला मारता है । काई थूकता है, मगर उस मर्द का दिल नहीं हिलता। कोई क्षुद्रहृदय और कायर होता तो अपनी बादशाहत के बल की गुत्थियाँ खोल देता; अपनी ताकत का नष्ट कर देता; और संभव है कि एक निगाह से उस सत्तनत के तख्ते को उलट