पृष्ठ:निबंध-रत्नावली.djvu/१४४

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

१०४ निबंध-रत्नावली गए और वहीं राजा के सामने क्षण भर में अपने खून में ढेर हो गए। ऐसे देवी वीर रुपया, पैसा माल, धन का दान नहीं दिया करते । जब वे दान देने की इच्छा करते हैं तब अपने आपको हवन कर देते है। बुद्ध महाराज ने जब एक राजा को मृग मारते देखा तब अपना शरीर आगे कर दिया जिसमें मृग बच जाय, बुद्ध का शरीर चाहे चला जाय। ऐसे लोग कभी बड़े मौकों का इंतिजार नहीं करतः छोटे मौकों को ही बड़ा बना देते हैं। जब किसी का भाग्योदय हुआ और उसे जोश आया तब जान लो कि संसार में एक तूफान आ गया। उसकी चाल के सामने फिर कोई रुकावट नहीं आ सकती। पहाड़ों की पस- लियाँ तोड़कर ये लोग हवा के बगाल की तरह निकल जाते हैं, उनके बल का इशारा भूचाल देता है और उनके दिल को हरकत का निशान समुद्र का तूफान देता है। कुदरत की और कोई ताकत उसके सामने फटक नहीं सकती। सब चीजें थम जाती हैं। विधाता भी सांस रोककर उनकी राह को देखता है। योरप में जब रोम के पोप का जोर बहुत बढ़ गया था तब उसका मुकाबला कोई भी बादशाह न कर सकता था। पोप की आँखों के इशारे से योरप के बादशाह तख्त से उतार दिये जा सकते थे। पोप का सिक्का योरप के लोगों पर ऐसा बैठ गया था कि उसकी बात को लोग ब्रह्म-वाक्य