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नागरीप्रचारिणी पत्रिका

१६२ नागरीप्रचारिणो पत्रिका एणों के साथ भारतीयों का महान् युद्ध दुना। विक्रमादित्य ने अपने तीक्ष्ण किरणरूपी तीरों से शत्रुरूपी समुद्र को विदीर्ण कर दिया। विक्रमा. दित्य का विक्रम हूण-स्त्रियों के रक्तिम कपोलों में प्रतिबिंबित दुमा और हूण भारतीय सम्राट के सामने पराजित और नतमस्तक हुए।' रास्ता ते करने में सुकुमार भारतीयों को बहुत कठिनाइयाँ झेलनी पड़ी थीं। उनके घोड़े भी थक गए थे। अतः उन्होंने कुछ आराम किया और उनके घोड़ों ने बंच के कुंकुमाकीर्ण तट पर लेटकर अपनी थकान मिटाई। अब मध्य एशिया में कोई अन्य शक्ति ऐसी नहीं रह गई थी जो भारतीयों का सामना कर सकती। अतः भारतीय सेना धापस बोटने लगी। कश्मीर के दरौं से वह गुजरी। यहाँ कंबोज बसते थे, जिनको जीतमा कठिन काम नहीं था। अतः इन्हें जीतकर गुप्त-सेना हिमालय से होती हुई दक्षिण भारत की ओर बढ़ने लगी। हिमालय के इसी प्रदेश में किरातों, किन्नरों और उत्सवसंकेतगणों के साथ युद्ध हुआ। कंबोज प्रदेश के नीचे, कश्मीर और अभिसार के पास, पर्वतीय लोगों का गण था जो झेलम नदी पर स्थित 'साल्टरेज' के चारों तरफ फैला हुआ था। पाणिनो ने तक्षशिलादि गण में 'पर्वत' देश का उल्लेख किया है और 'महाभारत' में पर्वतीयों के गणों का उल्लेख है। यह गण पहले बहुत प्रभावशाली था और एक समय राजतंत्र भी ग्रहण कर चुका था। सिकंदर के महान् प्रतिद्वंद्वी पोरस इसी पर्वतीय गण के राजा थे और उन्होंने सिकंदर के प्रस्थान के पश्चात् चंद्रगुप्त मौर्य को पाटलिपुत्र १-तता प्रतस्थे कौबेरी भास्वानिय रघुर्दिशम् । शररुन रिवोदीच्यानुवरिष्यरसानिव ।। ६६ ।। विनीताध्वश्रमास्तम्य वनुतीरविचेष्टनैः । दुधुवुर्वाजिनः स्कन्धास्तग्नकुछ कुमकेसरान् ।। ६७ ॥ तत्र तणावरोधानां भर्तृषु व्यक्त विक्रमम् । कपोलपाटलादेशि बभव रघुचेष्टितम् ।। ६८ ||-रघुवंश, सर्ग ४ । २-विजित्य चाहवे शूरान्पार्वतीयान्महारथान् । जिगाय सेनया राजन्पुरं पौरवरक्षितम् ।। पौरवं युधि निर्जित्य दस्यून्पर्वतवास्मिना । गणानुत्सवमतानजयत्मप्तपाण्डव ।। तता काश्मीरकान्वीरान क्षत्रियान् क्षत्रियर्षभः । इत्यादि । -महाभारत, सभा पर्व, अध्याय २७ ।