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नव-निधि


अपने महल में पहुँचे, पर भीतर पैर रखने भी न पाये थे कि छींक हुई, और बाई आँख फकड़ने लगी। राजनन्दिनी भारती का थाल लेकर लपकी, पर उसका पैर फिसल गया और थाल हाथ से छटकर गिर पड़ा। धर्मसिंह का माथा ठनका और राजनन्दिनी का चेहरा पीला हो गया। यह असगुन क्यों ?

व्रजविलासिनी ने दोनों राजकुमारों के आने का समाचार सुनकर उन दोनों को देने के लिए दो अभिनन्दन पत्र बना रखे थे। सवेरे जब कुँवर पृथ्वीसिह सन्ध्या आदि नित्य-क्रिया से निपटकर बैठे, तो वह उनके सामने आई और उसने एक सुन्दर कुश की चुंगेली में अभिनन्दन पत्र रख दिया। पृथ्वीसिंह ने उसे प्रसन्नता से ले लिया। कविता यद्यपि उतनी बढ़िया न थी, पर वह नई और वीरता से भरी हुई थी। वे वीररस के प्रेमी थे, उसको पढ़कर बहुत खुश हुए और उन्होंने मोतियों का हार उपहार दिया।

व्रजविलासिनी यहाँ से छुट्टी पाकर कुँवर धर्मसिंह के पास पहुंची वे बैठे हुए राजनन्दिनी को लडाई की घटनाएँ सुना रहे थे, पर ज्यों ही व्रजविलासिनी की आँख उनपर पड़ी, वह सन्न होकर पीछे हट गई। उसको देखकर धर्मसिंह के चेहरे का भी रंग उड़ गया, होंठ सूख गये और हाथ-पैर सनसनाने लगे। व्रज-विलासिनी तो उलटे पाँव लौटी ; पर धर्मसिंह ने चारपाई पर लेटकर दोनों हाथों से मुँह बँक लिया। राजनन्दिनी ने यह दृश्य देखा और उसका फूल-सा बदन पसीने से तर हो गया। धर्मसिंह सारे दिन पलंग पर चुपचाप पड़े करवट बदलते रहे। उनका चेहरा ऐसा कुम्हला गया। जैसे वे बरसों के रोगी हों। राजनन्दिनी उनकी सेवा में लगी हुई थी। दिन तो यों कटा, रात को कुँवर साहब सन्ध्या ही से यकाषट का बहाना करके लेट गये। रामनन्दिनी हेरान थी कि माजरा क्या है। वनविलासिनी इन्हीं के खून की प्यासी है ? क्या यह सम्भव है कि मेरा प्यारा, मेरा मुकुट धर्मसिंह ऐसा कठोर हो ? नहीं, नहीं, ऐसा नहीं हो सकता ।वह यद्यपि चाहती है कि अपने भावों से उनके मन का बोझ हलका करे, पर नहीं कर सकती। अन्त को नींद ने उसको अपनी गोद में ले लिया।

रात बहुत बीत गई है। प्राकाश में अंधेरा छा गया है। सारस की दुःख से भरी बोली कभी-कभी सुनाई दे जाती है। और रह-रहकर किले के सन्तरियों