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नव-निधि


बादशाह-एक घोड़े के लिये?

रानी-नहीं,उस पदार्थ के लिये जो संसार में सबसे अधिक मूल्यवान् है।

बादशाह-वह क्या है?

रानी-अपनी आन।

इस भाँति रानी ने घोड़े के लिए अपनी विस्तृत जागीर, उच्च रान-पद और राज-सम्मान सब हाथ से खोया और केवल इतना ही नहीं,भविष्य के लिए काँटे बोये,इस घड़ी से अन्त दशा तक चम्पतराय को शान्ति न मिली।

राना चम्पतराय ने फिर औरछे के किले में पदार्पण किया। उन्हें मन्सब और जागीर के हाथ से निकल जाने का अत्यन्त शोक हुआ,किन्तु उन्होंने अपने मुंह से शिकायत का एक शब्द भी नहीं निकाला। वे सारन्धा के स्वभाव को भली-भाँति जानते थे। शिकायत इस समय उसके आत्म-गौरव पर कुठार का काम करती।

कुछ दिन यहाँ शान्तिपूर्वक व्यतीत हुए। लेकिन बादशाह सारन्धा की कठोर बातें भूला न था,वह क्षमा करना जानता ही न था। ज्यों ही भाइयों की ओर से निश्चित हुआ,उसने एक बड़ी सेना चन्पतराय का गर्व चूर्ण करने के लिये भेजी और बाईस अनुभवशील सरदार इस मुहीम पर नियुक्त किये। शुभकरण हुँदेला बादशाह का सूबेदार था। वह चम्पतराय का बचपन का मित्र और सहपाठी था। उसने चम्पतराय को परास्त करने का बीड़ा उठाया। और भी कितने ही बुंदेला सरदार राजा से विमुख होकर बादशाही सूबेदार से आ मिले। एक घोर संग्राम हुा। भाइयों की तलवारें रक्त से लाल हुई। यद्यपि इस समर में राजा को विजय प्राप्त हुई, लेकिन उनकी शक्ति सदा के लिये क्षीण हो गई। निकटवर्ती बँदेला राजा जो चम्पतराय के बाहुबल थे,बादशाह के कृपाकांक्षी बन बैठे। साथियों में कुछ तो काम आये,कुछ दगा कर गये। यहाँ तक कि निज सम्बन्धियों ने भी आँखें चुराली। परन्तु इन कठिनाइयों में भी चम्पतराय ने हिम्मत नहीं हारी,धीरन को न छोड़ा। उन्होंने ओरछा छोड़ दिया और वे तीन वर्ष तक बुन्देलखण्ड के सघन पर्वतों पर छिपे फिरते रहे। बादशाही सेनाएँ शिकारी जानवरों की भाँति सारे देश में मँडरा रही थीं। आये दिन राजा का किसी न किसी से सामना हो