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नव-निधि

मुहब्बत खींचे लिये आती थी। यहाँ तक कि ओरछे के जंगलों में आ पहुचे। साथ के आदमी पीछे छूट गये। दोपहर का समय था। धूप तेज़ थी। वे घोड़े से उतरे और एक पेड़ की छाँह में जा बैठे। भाग्यवश आज हरदौल भी जीत की खुशी में शिकार खेलने निकले थे। सैकड़ों बुन्देला सरदार उनके माय थे। सब अभिमान के नशे में चूर थे। उन्होंने राजा जुझारसिंह को अकेले बैठे देखा,पर वे अपने घमण्ड में इतने डूबे हर थे कि इनके पास तक न पाये। समझा कोई यात्री होगा। हरदौल की आँखों ने भी धोखा खाया। वे घड़े पर सवार अक्ड़ते हुए जुझारसिंह के सामने आये और पूछना चाहते थे कि तुम कौन हो कि भाई से आँख मिल गई। पहचानते ही घोड़े से कूद पड़े और उनको प्रणाम किया। राजा ने भी उठकर हरदौल को छाती से लगा लिया ! पर उस छाती में अन भाई की मुहब्बत न थी। मुहब्बत की जगह ईर्षा ने घेर ली थी, और वह केवल इसीलिए कि हरदौल दूर से नंगे पैर उनकी तरफ न दौड़ा, उसके सब रों ने दूर ही से उनकी अभ्यर्थना न की। सन्ध्या होते-होते दोनों भाई ओरछे पहुंचे ।राजा के लौटने कासमाचार पाते ही नगर में प्रसन्नता की दुंदुभी बनने लगी। हर जगह आनन्दोत्सव होने लगा और तुरताफुरती सारा शहर जगमगा उठा।

आज रानी कुलीना ने अपने हाथों भोजन बनाया। नौ बजे होंगे।लौंडी ने आकर कहा-महाराज, भोजन तैयार है। दोनों भाई भोजन करने गये। सोने के थाल में राजा के लिए भोजन परोसा गया और चाँदी के थाल में हरदौल के लिए। कुलीना ने स्वयं भोजन बनाया था, स्वयं थाल परोसे थे,और स्वयं ही सामने लाई थी,पर दिनों का चक्र कहो, या भाग्य के दुर्दिन,उसने भूल से सोने का थाल हरदौल के आगे रख दिया और चाँदी का राजा के सामने। हरदौल ने कुछ ध्यान न दिया, वह वर्ष-भर से सोने के थाल में खाते-खाते उसका आदी हो गया था, पर जुझारसिंह तलमला गये। जबान से कुछ न बोले, पर तीवर बदल गये और मुँह लाल हो गया। रानी की तरफ घूर-कर देखा और भोजन करने लगे। पर ग्रास विष मालूम होता था। दो-चार ग्रास खाकर उठ आये। रानी उनके तीवर देखकर डर गई। आज कैसे प्रेम से उसने भोजन बनाया था, कितनी प्रतीक्षा के बाद यह शुभ दिन आया था,