पृष्ठ:दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता.djvu/२८२

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हपिकेस क्षत्री, आगरे के २७३ कै महादुःख होत है । यह सुनि के श्रीगुसांईजी हृषिकेस सों कहे, जो - सदा श्रीजी और श्रीनवनीतप्रियजी पास विराजे तो इतनी आरति हम कों न होंइ । काहेते, जव श्रीनवनीतप्रिय- जी के निकट हम रहत हैं तव तो श्रीनाथजी को स्मरन होत है। तव विरह होत है। पाठे जव श्रीजीद्वार जात हैं । तब श्रीनवनीतप्रियजी को स्मरन होत हैं, जो - वालक है, वेगि जायो चहिए । या प्रकार आरति सिद्ध होत है । ताते श्रीजी श्रीगोवर्द्धन पर्वत पर सदा विराजे । श्रीनवनीतप्रियजी श्रीगो- कुल में सदा विराजे । ताही में आछौ है। भावप्रकाश-यह कहि यह जताए, जो - सेवा में संयोग-विपयोग दोऊ. भाव राखने, तात रूचि वढें । यह सुनि के हृपिकेस ने श्रीगुसांईजी को दंडवत करि के विनती करी, जो - महाराज ! हम तुच्छ बुद्धि हैं । तातें महा- राज ! हम आप के भाव को कहा जाने ? और आप करत हो सो तो हमारे हित के लिये अव आछी करत हो। या प्रकार सगरी राह श्रीगुसांईजी सों भगवद्वार्ता करत श्रीजीद्वार आए । तव श्रीगुसांईजी तत्काल स्नान करि के उत्यापन की झारी भरि कै श्रीनाथजी के मंदिर में पधारे। श्रीनाथजी के दरसन करे । ता पाळे हृपिकेस कों दरसन कराए। सो इपिकस दरसन करि कै वोहोत प्रसन्न भए । ता समे हृषिकेस ने एक एक कीर्तन नट राग में गायो । सो पद परम कृपाल श्रीवल्लभनंद। भक्त मनोरथ पूरन कारन भुव पर आये आनंद कंद ॥ गिरिधरलाल प्रगट दिखाए पुष्टिभक्ति रसदान किये । 'हृपिकेस' सिर सदा विराजो यह जोरी सुख नन दिये ।। ३५