पृष्ठ:दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता.djvu/१८१

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१६४ दोसौ वावन वैष्णवन की वार्ता जब श्रीठाकुरजी वोलें । मांगि मांगि के लेई तो सेवा करें। तब श्रीगुसांईजी ने कही, जो - भाव सौ सेवा करो। श्री- ठाकुरजी तुम्हारो सव मनोरथ पूरन करेंगे। पाछे श्रीगुसांईजी ने सेवा पधराय दीनी । ता पाठे वैष्णवन सों मिलि के सेवा पधराय कै सेवा की रीति भांति सव सीखे । पाछे एक भाई सामग्री करे, एक भाई सिंगार करे। सो नित्य मंगला के सातों स्वरूपन के दरसन करे । तव दोई वैष्णवन को न्योतो दे आवते । ता पाछे दोऊ सेवा में न्हाते । सो राजभोग धरि के समय होइ तव भोग सराय महाप्रसाद वैष्णवन कों लिवावते । ता पाजें आप लेते । या प्रकार नित्य नेम ते भाव सहित सेवा करे । सो श्रीठाकुरजी सानुभावता जनावन लागे। वार्ता प्रसग-३ सो एक दिना श्रीठाकुरजी ने कही, जा - मैं तुम पै प्रसन्न भयो हूँ । सो कछ मांगो । तब इन कही, जो - श्रीगुसांईजी की कृपा तें और तो सब है। परंतु एक, श्रीगुसांईजी की सेवा करिव को मनोरथ है। भावप्रकाश-यामें ठाकुरतें गुरुकी सेवा दुर्लभ दिखाए । तब श्रीठाकुरजी ने कही, जो - करो। पाठें एक दिना श्रीगुसांईजी ने पूछी, जो - कहो वेनीदास ! श्रीठाकुरजी कछ सानुभावता जनावत हैं ? तब इन कही, जो- राज की कृपा ते बोलत हैं । तब श्रीगुसांईजी ने कही, जो - कछू कही है ? तब इन कही, जो - श्रीठाकुरजी ने कही, जो - कछु मांगो। तब मैंने कही, जो - श्रीगुसांईजीकी सेवा करें । तब श्रीठाकुरजी ने कही, जो-करो। पाछे श्रीगुसांईजी आज्ञा किये, जो तुम